
उत्तर छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले से जालसाजी का एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरे प्रशासनिक अमले को हिलाकर रख दिया है। जिले के 127 गरीब किसानों के नाम पर फर्जी तरीके से करोड़ों रुपये का लोन निकाल लिया गया। किसानों को इस बात की भनक तक नहीं थी कि उनके नाम पर बैंक में कर्ज दर्ज है। जब यह मामला कलेक्टर तक पहुंचा, तो जांच में बड़े पैमाने पर हेराफेरी की पुष्टि हुई। अब इस मामले में बैंक और सहकारी समिति के 8 दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
धान का पैसा लेने पहुंचे किसान तो खुला राज
यह पूरा मामला सीतापुर थाना क्षेत्र के केरजू सहकारी समिति का है। घोटाला तब उजागर हुआ जब समर्थन मूल्य पर धान बेचने वाले किसान अपनी मेहनत की कमाई लेने सहकारी बैंक पहुंचे। वहां उन्हें पता चला कि उनके खातों में पहले से ही भारी-भरकम लोन दर्ज है और धान बिक्री की राशि उस कर्ज को चुकाने में काट ली गई है। कई किसान ऐसे थे जिन्होंने कभी लोन लिया ही नहीं था, और कुछ ने अगर 30-40 हजार का कर्ज लिया था, तो उनके खातों में 3 से 5 लाख रुपये का बकाया दिखाया जा रहा था।
करीब 2 करोड़ की जालसाजी, 1900 पन्नों की जांच रिपोर्ट
किसानों के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए सरगुजा कलेक्टर अजीत वसंत ने सीतापुर एसडीएम के नेतृत्व में एक संयुक्त जांच दल का गठन किया था। जांच टीम ने जब दस्तावेजों को खंगाला तो पैरों तले जमीन खिसक गई। पता चला कि जालसाजों ने 127 किसानों के फर्जी हस्ताक्षर कर कुल 1 करोड़ 92 लाख 82 हजार 96 रुपये का गबन किया है। जांच दल ने अपनी रिपोर्ट के साथ 1900 पन्नों का दस्तावेजी सबूत जिला सहकारी बैंक के सीईओ को सौंपा है, जिसमें घोटाले की परत-दर-परत जानकारी दी गई है।
समिति प्रबंधक की आत्महत्या ने उलझाया मामला
इस घोटाले का एक दुखद पहलू यह भी है कि केरजू सहकारी समिति के तत्कालीन प्रबंधक दिनेश गुप्ता ने 25 दिसंबर 2025 की रात अपने घर में फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली थी। बताया जा रहा है कि सुसाइड से पहले बैंक में लोन समायोजन को लेकर किसानों और प्रबंधक के बीच तीखी बहस हुई थी। चर्चा है कि प्रबंधक को इस करोड़ों के फर्जीवाड़े की पूरी जानकारी थी और वे भारी मानसिक दबाव में थे। पुलिस अब इस खुदकुशी के तार भी इस बड़े घोटाले से जोड़कर देख रही है।
इन 8 अधिकारियों और कर्मचारियों पर गिरी गाज
कलेक्टर के आदेश के बाद उन चेहरों की पहचान हो गई है जिन्होंने व्यवस्था का फायदा उठाकर किसानों को ठगा। दोषी पाए गए लोगों में तत्कालीन प्राधिकृत अधिकारी मदन सिंह और जोगी राम, वरिष्ठ सहकारी निरीक्षक सैनाथ केरकेट्टा, तत्कालीन शाखा प्रबंधक भूपेंद्र सिंह परिहार, सहायक लेखापाल शिवशंकर सोनी, कैशियर ललिता सिन्हा, सामान्य सहायक सुमित कुमार और कंप्यूटर ऑपरेटर दीपक कुमार चक्रधारी शामिल हैं। इन सभी के खिलाफ धोखाधड़ी और सरकारी धन के गबन की धाराओं में मामला दर्ज किया जा रहा है।
फर्जी हस्ताक्षर और कागजी हेरफेर का खेल
जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि यह घोटाला बिना बैंक कर्मियों की मिलीभगत के संभव नहीं था। आरोपियों ने बड़ी ही चालाकी से किसानों के नाम पर फर्जी फाइलें तैयार कीं और उनके फर्जी हस्ताक्षर कर लोन की राशि स्वीकृत कर ली। इसके बाद इस राशि का आहरण (विड्रॉल) भी खुद ही कर लिया गया। जब सरकारी रिकॉर्ड में एंट्री हुई, तो गरीब किसान कर्जदार बन गए। कलेक्टर ने स्पष्ट किया है कि किसानों के साथ हुए इस अन्याय की भरपाई की जाएगी और दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।
कलेक्टर का सख्त आदेश: तत्काल दर्ज हो मुकदमा
सरगुजा कलेक्टर ने जिला सहकारी बैंक के सीईओ को कड़े निर्देश देते हुए कहा है कि सभी 8 दोषियों के खिलाफ तत्काल प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई जाए। कलेक्टर ने आदेश की प्रति के साथ सभी आवश्यक दस्तावेज पुलिस को सौंपने को कहा है। प्रशासन के इस कड़े रुख से जिले के अन्य भ्रष्ट कर्मचारियों में हड़कंप मच गया है। कलेक्टर अजीत वसंत ने साफ कर दिया है कि किसानों के हक का पैसा डकारने वालों के लिए जेल ही सही जगह है।
किसानों में आक्रोश, सुरक्षा और न्याय की मांग
इस घोटाले के सामने आने के बाद सीतापुर और आसपास के इलाकों के किसानों में भारी गुस्सा है। प्रभावित किसानों का कहना है कि वे पहले से ही आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं और अब इस फर्जी कर्ज ने उनकी कमर तोड़ दी है। किसानों ने मांग की है कि उनके खातों से फर्जी कर्ज की एंट्री तुरंत हटाई जाए और काटा गया धान का पैसा वापस किया जाए। प्रशासन ने किसानों को भरोसा दिलाया है कि जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद उनके खातों को दुरुस्त कर दिया जाएगा।
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