
छत्तीसगढ़ के सबसे चर्चित शिक्षा घोटालों में से एक ‘पोराबाई नकल प्रकरण’ में अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। 2008 की 12वीं बोर्ड परीक्षा में फर्जी तरीके से स्टेट टॉप करने वाली पोराबाई और उसके तीन साथियों को 18 साल के लंबे इंतजार के बाद सजा मिली है। द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश जीआर पटेल ने दोषियों को पांच साल के कठोर कारावास और पांच हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। इस फैसले ने साफ कर दिया है कि शिक्षा व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करने वालों को कानून कभी नहीं बख्शता।
क्या था 2008 का पोराबाई कांड?
यह पूरा मामला सरस्वती शिशु मंदिर बिर्रा की छात्रा पोराबाई से जुड़ा है। छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल (CGBSE) के 2008 के नतीजों में पोराबाई ने 500 में से 484 अंक हासिल कर पूरे प्रदेश में पहला स्थान पाया था। अचानक एक ग्रामीण इलाके की छात्रा का नाम टॉपर्स की लिस्ट में सबसे ऊपर देखकर हर कोई हैरान था। बाद में हुई जांच में यह कड़वा सच सामने आया कि पोराबाई ने खुद परीक्षा देने के बजाय किसी और से अपनी उत्तर पुस्तिकाएं लिखवाई थीं ताकि वह मेरिट लिस्ट में आ सके।
बोर्ड अध्यक्ष को ऐसे हुआ शक
उस वक्त शिक्षा मंडल के अध्यक्ष बीकेएस रे थे। टॉपर की उपलब्धि से खुश होकर जब उन्होंने खुद पोराबाई को सम्मानित करने की सोची, तो उससे पहले सावधानी के तौर पर उसकी कॉपियां मंगवाईं। उत्तर पुस्तिकाएं देखते ही वे ठिठक गए। कॉपियों में इस्तेमाल की गई अंग्रेजी का स्तर बहुत ऊंचा था और लिखावट इतनी साफ-सुथरी थी कि किसी अनुभवी विद्वान जैसी लग रही थी। एक औसत ग्रामीण छात्रा के लिए ऐसा प्रदर्शन नामुमकिन सा था। इसी शक के आधार पर गोपनीय जांच के आदेश दिए गए।
खराब रिकॉर्ड ने खोली पोल
जांच के दौरान जब पोराबाई के पिछले सालों का शैक्षणिक रिकॉर्ड खंगाला गया, तो कहानी पूरी तरह बदल गई। पता चला कि पोराबाई पहले कभी प्रथम श्रेणी में पास ही नहीं हुई थी; वह अक्सर फेल होती थी या तीसरे दर्जे से पास होती थी। परीक्षा केंद्र से मिली जानकारी ने तो चौंका ही दिया, वहां के रिकॉर्ड के अनुसार पोराबाई परीक्षा देने केंद्र पर पहुंची ही नहीं थी। इन पक्के सबूतों के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज किया और साजिश में शामिल नौ लोगों को गिरफ्तार किया।
कोर्ट की टिप्पणी: मेहनती छात्रों के साथ अन्याय
इस मामले में 12 साल पहले सबूतों के अभाव में आरोपी बरी हो गए थे, लेकिन शिक्षा मंडल की अपील पर दोबारा सुनवाई शुरू हुई। सजा सुनाते हुए न्यायाधीश जीआर पटेल ने सख्त टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यह धोखाधड़ी सिर्फ बोर्ड के साथ नहीं, बल्कि उन लाखों ईमानदार छात्रों के भविष्य के साथ अपराध है जो दिन-रात कड़ी मेहनत करते हैं। अदालत ने माना कि ऐसी घटनाओं से समाज का शिक्षा प्रणाली पर से भरोसा उठ जाता है, इसलिए दोषियों को कड़ी सजा देना जरूरी है।

18 साल की कानूनी लड़ाई का अंत
इस फैसले ने प्रदेश के उन सभी जालसाजों को कड़ा संदेश दिया है जो शार्टकट के जरिए सफलता पाना चाहते हैं। पोराबाई के साथ फूलसिंह, एसएल जाटव और दीपक जाटव को भी जेल भेजा गया है। 2008 से 2026 तक चली इस कानूनी जद्दोजहद ने साबित कर दिया कि न्याय में देरी भले ही हो, लेकिन अंततः सच की ही जीत होती है। आज इस फैसले की चर्चा पूरे छत्तीसगढ़ के गलियारों में है, क्योंकि यह मामला प्रदेश की साख से जुड़ा था।



