
छत्तीसगढ़ के शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताजा मामला बिलासपुर जिले के कोटा विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) कार्यालय से सामने आया है, जहाँ सरकारी राशि के दुरुपयोग ने प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मचा दिया है। अनुभवहीन अधिकारियों की तैनाती का फायदा उठाकर उनके अधीनस्थों ने लाखों रुपये का गबन कर लिया। इस घोटाले के उजागर होने के बाद विभाग की छवि पर एक बार फिर गहरा दाग लगा है और सरकारी सिस्टम की पारदर्शिता पर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं।
लेखापाल और कर्मचारी की जुगलबंदी ने किया बड़ा फर्जीवाड़ा
कोटा बीईओ कार्यालय में पदस्थ मुख्य लेखापाल नवल सिंह पैकरा और कार्यालय कर्मचारी देवेंद्र कुमार पालके पर इस पूरे घोटाले की साजिश रचने का आरोप है। विभागीय जांच में यह बात सामने आई है कि इन दोनों ने मिलकर सरकारी रिकॉर्ड में कूट रचना की और पद का दुरुपयोग करते हुए सीधे शासन की राशि को अपने निजी लाभ के लिए इस्तेमाल किया। इन कर्मचारियों की संदिग्ध गतिविधियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिना जमीनी स्तर के कर्मचारियों की मिलीभगत के इतना बड़ा वित्तीय गबन संभव नहीं था।
‘अन्य भत्ते’ के नाम पर 6 महीनों तक चला गबन का खेल
बीईओ नरेंद्र मिश्रा द्वारा दर्ज कराई गई रिपोर्ट के अनुसार, यह फर्जीवाड़ा सितंबर 2024 से फरवरी 2025 के बीच अंजाम दिया गया। आरोपियों ने चतुराई से ‘अन्य भत्तों’ (Other Allowances) के मद में फर्जी बिल और प्रविष्टियां तैयार कीं। उन्होंने दस्तावेजों में असामान्य वृद्धि दर्शाते हुए कुल ₹30 लाख की शासकीय राशि को अवैध तरीके से आहरित कर लिया। यह पूरी प्रक्रिया इतने शातिर तरीके से की गई कि महीनों तक किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी और सरकारी खजाना धीरे-धीरे खाली होता रहा।
ऑडिट के दौरान खुली पोल: संदिग्ध प्रविष्टियों ने खोला राज
इस घोटाले का भंडाफोड़ नियमित लेखा परीक्षण (Audit) के दौरान हुआ। जब ऑडिट टीम ने कार्यालय के वित्तीय अभिलेखों की जांच की, तो उन्हें ‘अन्य भत्तों’ की श्रेणी में अचानक हुई भारी बढ़ोतरी पर संदेह हुआ। जब आंतरिक स्तर पर दस्तावेजों का बैंक लेन-देन की प्रविष्टियों से मिलान किया गया, तो कड़ियों से कड़ियाँ जुड़ती गईं और ₹30 लाख के गबन का कच्चा चिट्ठा सामने आ गया। वरिष्ठ अधिकारियों को मामले की गंभीरता से अवगत कराया गया, जिसके बाद पुलिस में एफआईआर दर्ज कराने का निर्णय लिया गया।
पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत दर्ज किया मामला
विकासखंड शिक्षा अधिकारी नरेंद्र मिश्रा की लिखित शिकायत पर कोटा पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए अपराध क्रमांक 171/26 दर्ज किया है। आरोपियों के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न गंभीर धाराओं, जिनमें धोखाधड़ी, कूट रचना और गबन से जुड़ी धाराएं 316(5), 318(4), 338, 340(2), 336(3) तथा 3(5) शामिल हैं, के तहत प्रकरण पंजीबद्ध किया गया है। पुलिस अब बैंक खातों के विवरण खंगाल रही है और आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए दबिश दे रही है।
प्रभारी राज और अनुभवहीनता: भ्रष्टाचार की असल जड़
शिक्षा विभाग के गलियारों में चर्चा है कि यह घोटाला विभाग में व्याप्त ‘प्रभारी राज’ का नतीजा है। छत्तीसगढ़ के कई जिलों में वरिष्ठ पदों पर अनुभवी अफसरों के बजाय जूनियर या प्रभारी अधिकारियों को बिठाया गया है। अनुभव की कमी के कारण ये अधिकारी अपने अधीनस्थों के कामकाज पर प्रभावी नियंत्रण नहीं रख पाते, जिसका फायदा उठाकर कर्मचारी भ्रष्टाचार को अंजाम देते हैं। जानकारों का कहना है कि जब तक महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर योग्य और अनुभवी अधिकारियों की नियुक्ति नहीं होगी, तब तक ऐसे घोटालों को रोकना मुश्किल होगा।
जांच के दायरे में अफसर: गर्दन बचाने की कोशिशें शुरू
इस घोटाले के सामने आने के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या बीईओ कार्यालय के शीर्ष अधिकारियों को इस हेरफेर की सच में जानकारी नहीं थी? या तो अधिकारी की मौन सहमति थी, या फिर उनकी लापरवाही इतनी बड़ी थी कि उनकी नाक के नीचे से ₹30 लाख पार हो गए। अक्सर ऐसे मामलों में देखा गया है कि उच्चाधिकारी अपनी गर्दन बचाने के लिए सारा दोष अपने अधीनस्थों पर मढ़ देते हैं। बहरहाल, कोटा पुलिस की गहन जांच ही यह स्पष्ट कर पाएगी कि इस गबन का असली मास्टरमाइंड कौन है और भ्रष्टाचार की यह जड़ें कितनी गहरी हैं।



