ये तो गजब हो गया: वन अफसरों को भनक तक नहीं लगी और 5 हजार पेड़ जंगल से हो गए गायब: हाईकोर्ट ने मांगी नई रिपोर्ट

बस्तर संभाग के भानुप्रतापपुर पूर्व वन मंडल से करीब 5,000 पेड़ों के अचानक गायब होने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। काचे गांव के रिजर्व फॉरेस्ट क्रमांक 608 में यह इलाका गोदावरी इस्पात को माइनिंग लीज के तौर पर दिया गया था। शुरुआती रिकॉर्ड के अनुसार, यहां 11,600 से अधिक पेड़ मौजूद थे। वन विभाग ने पहले चरण में 6,000 पेड़ों की कटाई की थी, लेकिन जब बजट की कमी के बाद टीम दोबारा पहुंची, तो बाकी बचे हजारों पेड़ मौके से नदारद मिले। यह मामला अब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की चौखट पर पहुंच गया है।

माइनिंग लीज रद्द करने के लिए जनहित याचिका

सामाजिक कार्यकर्ता राजेश रंगारी ने सूचना के अधिकार (RTI) से मिली जानकारियों के आधार पर इस घोटाले के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। अधिवक्ता समर्थ मरहास के जरिए दायर जनहित याचिका में मांग की गई है कि जिस कंपनी की लीज क्षेत्र से इतने बड़े पैमाने पर जंगल गायब हुआ है, उसकी माइनिंग लीज तुरंत निरस्त की जाए। याचिकाकर्ता का आरोप है कि नियमों को ताक पर रखकर संरक्षित वन क्षेत्र को नुकसान पहुँचाया गया है और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों व कंपनी पर सख्त कार्यवाही होनी चाहिए।

सड़क के नीचे पेड़ दबने के तर्क पर डीएफओ को शक

कोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष ने अजीबोगरीब दलील पेश की। बताया गया कि जांच दल को मौके पर पेड़ नहीं मिले और कुछ पेड़ भारी वाहनों की आवाजाही के कारण धंसी हुई सड़कों के नीचे दब गए। हालांकि, इस रिपोर्ट पर खुद वन मंडल अधिकारी (DFO) ने असंतोष जताया है। विभाग का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों का ‘दब जाना’ तार्किक नहीं लगता। डीएफओ ने इस मामले में संशोधित और अधिक सटीक रिपोर्ट की मांग की है ताकि असली सच्चाई सामने आ सके।

हाईकोर्ट ने वन विभाग से तलब की नई रिपोर्ट

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए वन विभाग को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने विभाग को निर्देश दिया है कि वह पूरे मामले की नए सिरे से जांच करे और अगली सुनवाई में विस्तृत रिपोर्ट पेश करे। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पर्यावरण और आरक्षित वनों की सुरक्षा के मामले में किसी भी तरह की कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अब मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होनी तय हुई है।

बजट की कमी और गायब होते जंगल का कनेक्शन

इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब 2018 में कटाई का बजट खत्म हुआ, तो विभाग ने उन पेड़ों की सुरक्षा के लिए क्या इंतजाम किए थे। माइनिंग लीज के विस्तार के बीच 32 हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र में पेड़ों का हिसाब न मिलना एक बड़े सिंडिकेट की ओर इशारा करता है। स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों का मानना है कि यह केवल पेड़ों की चोरी नहीं बल्कि एक सुनियोजित पारिस्थितिक अपराध है जिसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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