
CG School Exam Time Table: राजधानी रायपुर के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 9वीं और 11वीं के छात्रों के लिए बड़ी खबर है। जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय ने स्थानीय परीक्षाओं का टाइम-टेबल जारी कर दिया है जिसके तहत 27 फरवरी से पेपर शुरू होंगे। हालांकि इस फैसले ने हजारों छात्रों और उनके शिक्षकों की नींद उड़ा दी है। असल में कई स्कूलों में अब तक सिलेबस पूरा नहीं हो पाया है जिससे करीब 20 हजार छात्र मानसिक दबाव महसूस कर रहे हैं। शिक्षकों का कहना है कि वे पिछले महीनों में गैर-विभागीय कार्यों में व्यस्त थे जिसकी वजह से पढ़ाई समय पर पूरी नहीं हो सकी।
अचानक टाइम-टेबल आने से 200 स्कूलों में मचा हड़कंप
रायपुर जिले के 200 से अधिक स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों के लिए यह खबर किसी झटके से कम नहीं है। कोर्स पूरा न होने और अचानक परीक्षा की तारीखों के ऐलान से बच्चों के रिजल्ट पर बुरा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। विशेषकर 9वीं कक्षा के छात्रों में फेल होने का डर ज्यादा है क्योंकि उनकी नींव पहले से ही कमजोर मानी जाती है। जानकारों का कहना है कि परीक्षा के लिए सही योजना न बनाना शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करता है।
बोर्ड परीक्षा और कॉपियों की जांच के चलते लिया गया फैसला
छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल की ओर से 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाएं 20 फरवरी से 18 मार्च के बीच आयोजित की जा रही हैं। शिक्षा विभाग का तर्क है कि अगर 9वीं और 11वीं की परीक्षाएं बोर्ड परीक्षाओं के साथ ही नहीं निपटाई गईं तो बाद में दिक्कत आएगी। विभाग को डर है कि देरी होने पर शिक्षक बोर्ड की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में व्यस्त हो जाएंगे और स्थानीय परीक्षाओं के लिए स्टाफ की कमी हो जाएगी। इसी वजह से छात्रों की बेहतर तैयारी के बजाय बोर्ड कॉपियों की जांच को प्राथमिकता दी गई है।
लिखित आदेश मिलने में देरी से बढ़ी असमंजस की स्थिति
इस पूरे मामले में प्रशासनिक तालमेल की कमी भी सामने आई है। डीईओ हिमांशु भारती का दावा है कि स्कूलों को मौखिक तौर पर पहले ही तैयारी रखने को कह दिया गया था। इसके उलट स्कूलों का कहना है कि लिखित आदेश 23 फरवरी को जारी हुआ जिससे तैयारी के लिए बहुत कम समय बचा है। इतने कम दिनों में बचे हुए कोर्स को खत्म करना और रिवीजन कराना शिक्षकों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
9वीं के छात्रों पर फेल होने का सबसे ज्यादा खतरा
शिक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक कक्षा 8वीं तक ‘फेल न करने’ की नीति की वजह से 9वीं में आते ही छात्रों को अचानक कठिन पढ़ाई का सामना करना पड़ता है। रायपुर जिले के पुराने रिकॉर्ड बताते हैं कि हर साल 9वीं में करीब 40 फीसदी छात्र फेल हो जाते हैं। इस साल जब सिलेबस ही पूरा नहीं है तो अभिभावकों को डर सता रहा है कि फेल होने वाले बच्चों की संख्या पिछले सालों के मुकाबले कहीं ज्यादा न हो जाए।
शिक्षकों की व्यस्तता बनी पढ़ाई में बड़ी बाधा
शिक्षकों का तर्क है कि उन्हें पिछले कुछ महीनों में एसआईआर (SIR) जैसे कई अन्य कार्यों में लगा दिया गया था। लगातार ड्यूटी लगने के कारण वे क्लास नहीं ले पाए जिससे समय पर कोर्स पिछड़ गया। अब जब परीक्षाएं सिर पर हैं तो बच्चों के पास खुद से तैयारी करने का भी वक्त नहीं बचा है। ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में स्थिति और भी खराब है जहाँ विषयों के विशेषज्ञ शिक्षकों की कमी पहले से ही बनी हुई है।



