छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की शाखा कब बनी: एक ऐतिहासिक यात्रा

When was the Congress formed in Chhattisgarh: कांग्रेस का इतिहास, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने गठन के बाद छह दशकों तक देश को आज़ादी दिलाने के लिए संघर्ष किया। इस संघर्ष में छत्तीसगढ़ जैसे क्षेत्र ने भी अहम भूमिका निभाई। इस लेख में हम जानेंगे कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की शाखा कब बनी, इसका सामाजिक-राजनीतिक महत्व क्या था, और इसके पीछे किन प्रमुख नेताओं की भूमिका रही।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में ए.ओ. ह्यूम (एलेन ऑक्टेवियन ह्यूम) द्वारा की गई थी। वे ब्रिटिश भारतीय सिविल सेवा से सेवानिवृत्त अधिकारी थे। ऐसा माना जाता है कि ह्यूम और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड डफरिन ने कांग्रेस की नींव भारतीयों और ब्रिटिश सरकार के बीच संवाद का एक “सुरक्षा कवच” बनाने के उद्देश्य से रखी थी।

लेकिन बहुत जल्दी ही कांग्रेस केवल संवाद की संस्था न रहकर एक राष्ट्रव्यापी स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व करने वाली पार्टी बन गई।

छत्तीसगढ़ और कांग्रेस का प्रारंभिक संबंध

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की शाखा का सीधा प्रभाव 1905 से देखा गया, जब नागपुर में पहली प्रांतीय राजनीतिक परिषद का आयोजन हुआ। लेकिन इससे पहले ही, 1891 में नागपुर अधिवेशन में छत्तीसगढ़ के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था, जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र का कांग्रेस से जुड़ाव बहुत पुराना है।

1906 में जबलपुर में दूसरी प्रांतीय राजनीतिक परिषद आयोजित की गई, जिसमें दादा साहेब खापर्डे के स्वदेशी आंदोलन प्रस्ताव को मंज़ूरी मिली। इसी कालखंड में, रायपुर में कांग्रेस की शाखा की स्थापना हुई।

रायपुर में कांग्रेस शाखा की स्थापना 1906 में

रायपुर में कांग्रेस की शाखा की स्थापना 1906 में मानी जाती है। इस शाखा की स्थापना में बैरिस्टर सी.एम. ठक्कर का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के वैचारिक बीज बोए और संगठन की जमीनी संरचना तैयार की।

यह शाखा जल्द ही छत्तीसगढ़ में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनजागरण और आंदोलन का केंद्र बन गई। यही वह दौर था जब छत्तीसगढ़ की राजनीतिक चेतना जाग रही थी और कांग्रेस के झंडे तले एकजुट हो रही थी।

उग्र राष्ट्रवाद और नेतृत्व

छत्तीसगढ़ में उस समय उग्र राष्ट्रवादी विचारधारा तेजी से फैल रही थी। दादा साहेब खापर्डे और डॉ. मुन्जे जैसे नेताओं के समर्थक यहां सक्रिय थे। इनका मानना था कि प्रार्थना पत्रों और अहिंसक अपीलों से आज़ादी मिलना संभव नहीं है। इन नेताओं ने युवाओं को प्रेरित किया कि वे औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध सीधे संघर्ष करें।

छत्तीसगढ़ के युवाओं और बुद्धिजीवियों ने कांग्रेस की शाखा के माध्यम से इन विचारों को अपनाया और स्थानीय स्तर पर स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों में भाग लिया।

छत्तीसगढ़ के प्रमुख कांग्रेस नेता

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की शाखा को मजबूत बनाने वाले प्रमुख नेताओं में शामिल थे:

  • पंडित सुंदरलाल शर्मा – छत्तीसगढ़ के गांधी कहे जाने वाले इस नेता ने सामाजिक जागरूकता और स्वतंत्रता संग्राम को आगे बढ़ाया।
  • ठाकुर प्यारेलाल सिंह – मजदूर आंदोलनों और जन आंदोलन के प्रणेता थे।
  • डॉ. खूबचंद बघेल – छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के समर्थक और कांग्रेस के प्रमुख नेता रहे।

इन नेताओं ने कांग्रेस की विचारधारा को छत्तीसगढ़ के गांव-गांव तक पहुँचाया और जनता को राजनीतिक रूप से जागरूक किया।

स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़ की भागीदारी

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की शाखा बनने के बाद यहां के कार्यकर्ताओं ने देशव्यापी आंदोलनों में हिस्सा लिया:

  • असहयोग आंदोलन (1920)
  • नमक सत्याग्रह (1930)
  • भारत छोड़ो आंदोलन (1942)

इस दौरान अनेक नेताओं ने जेल यात्राएँ कीं, सत्याग्रह किया, और ब्रिटिश शासन का डटकर विरोध किया।

स्वतंत्रता के बाद की कांग्रेस

स्वतंत्रता के बाद, जब तक छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश का हिस्सा था, तब तक यहां कांग्रेस का प्रभुत्व बना रहा। 2000 में जब छत्तीसगढ़ एक अलग राज्य बना, तब भी कांग्रेस ने कई बार सरकार बनाई और राज्य की सामाजिक-आर्थिक नीतियों को दिशा दी।

वर्तमान में भूपेश बघेल की अगुवाई में कांग्रेस छत्तीसगढ़ में सशक्त राजनीतिक ताकत बनी हुई है।

निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की शाखा की स्थापना 1906 में रायपुर में हुई थी, लेकिन इसके बीज 1891 में ही पड़ चुके थे जब यहां के प्रतिनिधि नागपुर अधिवेशन में शामिल हुए थे। कांग्रेस की शाखा न केवल एक संगठन थी, बल्कि छत्तीसगढ़ के लोगों के मन में स्वतंत्रता की लौ जगाने वाला आंदोलन थी।

इसकी स्थापना और विकास में जिन नेताओं ने योगदान दिया, उन्होंने छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा से जोड़ा और एक सशक्त राजनीतिक चेतना का निर्माण किया।

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