
जगदलपुर: बस्तर का विश्वविख्यात दशहरा महापर्व रविवार रात से शुरू हो गया। इसकी शुरुआत हमेशा की तरह काछनगादी रस्म से हुई। इस बार भी चौथी कक्षा में पढ़ने वाली 10 साल की पीहू दास ने काछनदेवी का रूप धारण कर राजपरिवार को पर्व मनाने की अनुमति दी। परंपरा के अनुसार, वे बेल के कांटों से बने झूले पर लेटीं और बस्तर राजघराने को दशहरा आरंभ करने का आशीर्वाद दिया।

617 साल पुरानी परंपरा
Bastar Dussehra 2025: यह परंपरा करीब 617 साल से लगातार निभाई जा रही है। मान्यता है कि पनका जाति की अविवाहित कन्या ही इस रस्म को पूरा कर सकती है। 22 पीढ़ियों से इसी जाति की बेटियां यह विधान निभाती आई हैं। बीते वर्ष भी पीहू ने यह दायित्व संभाला था। इससे पहले अनुराधा नामक बालिका ने काछनदेवी का रूप धारण किया था।

काछनगुड़ी में आयोजित रस्म
यह रस्म जगदलपुर के भंगाराम चौक स्थित काछनगुड़ी में सम्पन्न हुई। यहां प्रतिदिन विशेष पूजा और भजन-कीर्तन होते रहे। रविवार को जैसे ही पीहू ने देवी की आराधना पूरी कर रस्म निभाई, परिसर में मौजूद हजारों श्रद्धालुओं ने जयकारे लगाए। बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव भी परंपरा के अनुसार देवी से दशहरा मनाने की अनुमति लेने पहुंचे।

मान्यताओं से जुड़ा महत्व
काछनदेवी को रण की देवी भी कहा जाता है। मान्यता है कि कन्या पर देवी की आत्मा आती है और वह महापर्व को निर्विघ्न संपन्न कराने का आशीर्वाद देती है। रस्म के दौरान पनका जाति की महिलाएं धनकुल बजाकर गीत गाती हैं। वातावरण वाद्ययंत्रों और जयकारों से गूंज उठता है।

बस्तर की सांस्कृतिक धरोहर
इतिहासकारों के मुताबिक, बस्तर महाराजा दलपत देव ने काछनगुड़ी का जीर्णोद्धार करवाया था। तब से अब तक यह परंपरा उसी स्थान पर निभाई जा रही है। बस्तर दशहरा का यह अनूठा विधान केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि बस्तर की जीवंत सांस्कृतिक विरासत है, जो सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है।



