
जगदलपुर: बस्तर दशहरे की खास रस्मों में शामिल निशा जात्रा की परंपरा इस बार भी महाअष्टमी की रात पूरी की गई। मंगलवार देर रात राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव ने मां खमेश्वरी की पूजा-अर्चना की। इस दौरान 12 बकरों की बलि दी गई और तांत्रिक विधि से पूजा संपन्न हुई। बस्तर दशहरे के इस पूजा की मान्यता है कि यह विधान बुरी आत्माओं और प्रेत-बाधाओं से राज्य की रक्षा के लिए किया जाता है।

कैसे होती है निशा जात्रा की पूजा
निशा जात्रा का इतिहास लगभग 617 साल पुराना है। पहले राजा-महाराजा इस रस्म को निभाते थे।
- पूजा के लिए 12 गांवों के राउत समुदाय की महिलाएं भोग तैयार करती हैं।
- इस अनुष्ठान में मीठे की जगह नमकीन भोग अर्पित किया जाता है।
- बलि के बाद मिट्टी के 12 पात्रों में रक्त भरकर देवी को चढ़ाया जाता है।
पहले इस रस्म में सैकड़ों भैंसों की बलि दी जाती थी, लेकिन अब यह परंपरा सिर्फ 12 बकरों की बलि तक सीमित रह गई है।
मावली परघाव की रस्म आज
महाअष्टमी की रात माता की डोली और छत्र जगदलपुर पहुंचे। आज शाम मावली परघाव की रस्म पूरी की जाएगी। इस दौरान राजपरिवार के सदस्य माता की डोली का स्वागत करेंगे। साथ ही जोगी उठाई की परंपरा भी होगी, जिसमें बस्तर क्षेत्र के देवी-देवताओं के विग्रह शामिल रहेंगे।
पंचमी का खास महत्व
मान्यता है कि माता केवल पंचमी के दिन ही राजमहल का न्योता स्वीकार करती हैं। इस वजह से पंचमी को विशेष पूजा की जाती है। इसी दिन राज परिवार के सदस्य माता के दरबार पहुंचते हैं। दर्शन कर पूजा अर्चना करते हैं और अपने साथ राजमहल चलने को कहते हैं। कमलचंद भंजदेव बताते हैं कि माता उनकी कुलदेवी हैं।



