
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के मैनपुर इलाके में आज उस समय अफरा-तफरी मच गई जब हजारों ग्रामीणों ने नेशनल हाईवे 130 सी को चारों तरफ से घेर लिया। राजा पड़ाव क्षेत्र की 8 पंचायतों के लगभग 2000 से अधिक ग्रामीण आज अपनी पुरानी मांग को लेकर सड़क पर उतर आए। इस चक्काजाम की वजह से हाईवे के दोनों तरफ छोटी और बड़ी गाड़ियों की लंबी कतारें लग गई और यातायात पूरी तरह से ठप हो गया। ग्रामीण काफी समय से अपने गांवों में बिजली पहुंचाने की मांग कर रहे हैं लेकिन प्रशासन की ओर से कोई ठोस पहल नहीं होने के कारण उनका गुस्सा फूट पड़ा है।
आजादी के दशकों बाद भी अंधेरे में रहने को मजबूर
हैरानी की बात यह है कि देश की आजादी के 78 साल बीत जाने के बाद भी इस इलाके के 20 से ज्यादा गांवों में अब तक बिजली नहीं पहुंच पाई है। प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों का कहना है कि 30 गांवों में से अधिकांश बस्तियां ऐसी हैं जहां लोगों ने आज तक बिजली का बल्ब जलते हुए नहीं देखा। शाम होते ही इन गांवों में सन्नाटा पसर जाता है जिससे बच्चों की पढ़ाई और महिलाओं की सुरक्षा पर बुरा असर पड़ता है। ग्रामीणों ने यह भी बताया कि बिजली के हक के लिए यह इस साल का चौथा बड़ा आंदोलन है क्योंकि बार-बार आश्वासन मिलने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है।

वन विभाग के नियमों और बजट की कमी के बीच उलझा प्रोजेक्ट
इस इलाके में बिजली न पहुंचने का एक बड़ा तकनीकी कारण इसका उदंती सीता नदी अभयारण्य के कोर जोन में होना है। जंगल के कड़े नियमों की वजह से यहां सामान्य खंभे लगाकर बिजली लाइन ले जाना मुमकिन नहीं था। इसके समाधान के लिए सरकार ने जमीन के अंदर यानी अंडरग्राउंड केबल बिछाकर बिजली देने की प्रशासनिक मंजूरी दी थी। शुरुआत में इस दिशा में कुछ काम भी शुरू हुआ था लेकिन साल 2023 के बाद काम को अचानक रोक दिया गया। जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि अब बजट की कमी का बहाना बनाकर इस महत्वपूर्ण काम को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
संवैधानिक अधिकारों और पेसा कानून का हवाला
राजा पड़ाव क्षेत्र संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है जहां पेसा कानून लागू है। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे प्रतिनिधियों का कहना है कि बिजली की सुविधा न देना सीधे तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन है। उनका तर्क है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर नागरिक को सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है और बिजली आज के समय में एक अनिवार्य जरूरत बन चुकी है। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन उनके विशेष संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी कर रहा है जिससे क्षेत्र के किसानों की सिंचाई क्षमता और युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ हो रहा है।
राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपकर आर-पार की लड़ाई का ऐलान
प्रदर्शनकारी अब अपनी मांगों को लेकर किसी भी तरह के समझौते के मूड में नहीं दिख रहे हैं। ग्रामीणों ने स्पष्ट किया है कि वे प्रशासन के माध्यम से राज्यपाल के नाम एक विस्तृत ज्ञापन सौंपेंगे जिसमें अपनी समस्याओं और सरकारी लापरवाही का जिक्र होगा। उनका कहना है कि जब तक काम दोबारा शुरू करने की कोई निश्चित तारीख नहीं दी जाती तब तक वे पीछे नहीं हटेंगे। फिलहाल मौके पर भारी पुलिस बल तैनात है और अधिकारी ग्रामीणों को समझा-बुझाकर हाईवे खाली कराने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन ग्रामीण अपनी मांग पर अड़े हुए हैं।



