
छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल (CGBSE) ने 10वीं और 12वीं की मुख्य परीक्षाओं से ठीक पहले एक सख्त कदम उठाया है। बोर्ड ने अटेंडेंस के नियमों का हवाला देते हुए राज्य के 1413 छात्रों को परीक्षा देने से रोक दिया है। मंडल के कड़े रुख के कारण इन छात्रों का एक साल बर्बाद हो गया है। अब ये छात्र इस शैक्षणिक सत्र में पेपर नहीं दे पाएंगे और उन्हें अगले साल दोबारा दाखिला लेकर अपनी उपस्थिति सुधारनी होगी।
आंकड़ों में समझें नुकसान: 10वीं के छात्र सबसे ज्यादा प्रभावित
बोर्ड द्वारा जारी सूची के अनुसार परीक्षा से वंचित होने वाले छात्रों में हाई स्कूल के विद्यार्थियों की संख्या सबसे अधिक है। कुल 1413 छात्रों में से 10वीं क्लास के 1,063 छात्रों को बाहर किया गया है जबकि 12वीं क्लास के 350 छात्र इस नियम की जद में आए हैं। बोर्ड ने स्पष्ट कर दिया है कि शैक्षणिक अनुशासन बनाए रखने के लिए 75 प्रतिशत उपस्थिति अनिवार्य है और जो छात्र इस आंकड़े तक नहीं पहुंच पाए उनके आवेदन रद्द कर दिए गए हैं।
परीक्षा की समय-सारणी: फरवरी के तीसरे हफ्ते से शुरू होगा इम्तिहान
छत्तीसगढ़ में बोर्ड परीक्षाओं का बिगुल बज चुका है। 12वीं की परीक्षाएं 20 फरवरी से शुरू होकर 18 मार्च 2026 तक चलेंगी जिसके लिए 2,45,785 छात्र पंजीकृत हैं। वहीं 10वीं की परीक्षा 21 फरवरी से 13 मार्च 2026 के बीच आयोजित की जाएगी जिसमें 3,20,535 परीक्षार्थी शामिल होंगे। पूरे प्रदेश में परीक्षाओं के सुचारू संचालन के लिए लगभग 4,900 से अधिक परीक्षा केंद्र तैयार किए गए हैं।
दिव्यांग परीक्षार्थियों को राहत: बोर्ड देगा राइटर और विशेष सुविधाएं
नियमों की सख्ती के बीच बोर्ड ने संवेदनशील रुख भी अपनाया है। शारीरिक रूप से अक्षम या किसी दुर्घटना के कारण लिखने में असमर्थ छात्रों के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। ऐसे विद्यार्थियों को परीक्षा में ‘लेखक’ (राइटर) की सुविधा दी जाएगी। बोर्ड ने यह भी सुनिश्चित किया है कि दिव्यांग छात्रों के परीक्षा केंद्र उनकी पहुंच के भीतर हों ताकि उन्हें आने-जाने में कोई दिक्कत न हो।
सत्र की शुरुआत से ही दी गई थी चेतावनी: अनदेखी पड़ी भारी
माध्यमिक शिक्षा मंडल ने शैक्षणिक सत्र के शुरू होते ही सभी स्कूलों और जिला शिक्षा अधिकारियों को निर्देश जारी कर दिए थे। स्कूलों को आदेश था कि वे कम उपस्थिति वाले छात्रों के माता-पिता को समय-समय पर सूचित करें और अतिरिक्त कक्षाएं लगाकर हाजिरी पूरी करने का प्रयास करें। केवल गंभीर बीमारियों की स्थिति में ही मेडिकल सर्टिफिकेट के आधार पर मामूली राहत देने का प्रावधान रखा गया था लेकिन अंतिम जांच में बड़ी संख्या में छात्र मापदंडों पर खरे नहीं उतरे।



