
छत्तीसगढ़ का सरगुजा अंचल अपनी समृद्ध जनजातीय संस्कृति और अनोखी परंपराओं के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, प्रकृति पूजन और सामुदायिक शौर्य का संगम है। स्थानीय बोली में ‘होरी’ के नाम से मशहूर इस पर्व में आधुनिक चकाचौंध के बजाय आदिम परंपराओं की झलक मिलती है। कोड़ाकू और कंवर जैसी जनजातियों के लिए यह समय बुराई पर अच्छाई की जीत के साथ-साथ अपनी जड़ों से जुड़ने का उत्सव है। यहाँ की होली में पत्थरबाजी, तीरंदाजी और महुआ के पेड़ों का इनाम इस त्योहार को दुनिया के अन्य हिस्सों से बिल्कुल अलग बनाता है।

50 मीटर की दूरी से सटीक निशाना और इनाम में ‘महुआ’ के पेड़
सरगुजा की कोड़ाकू जनजाति में होली के अवसर पर निशानेबाजी की एक अद्भुत परंपरा निभाई जाती है। होलिका दहन के बाद बची हुई सेमर की ठूंठ (लकड़ी) को एक लक्ष्य के रूप में स्थापित किया जाता है। ग्रामीण लगभग 50 फीट की दूरी से पत्थर और तीर-धनुष के जरिए इस पर निशाना लगाते हैं। जो प्रतिभागी सबसे सटीक निशाना लगाता है, उसे विजेता घोषित किया जाता है। इस प्रतियोगिता का सबसे दिलचस्प पहलू इसका पुरस्कार है—विजेता को सम्मान के तौर पर महुआ के दो पेड़ दिए जाते हैं। जनजातीय समाज में महुआ के पेड़ को ‘कल्पवृक्ष’ के समान माना जाता है, इसलिए यह इनाम अत्यंत प्रतिष्ठित होता है।
खजूरी और बैकोना: पुरुष और महिला स्वरूप की अनूठी मान्यता
सूरजपुर जिले के खजूरी और बैकोना गाँवों में होली मनाने का क्रम सदियों से तय है। यहाँ की मान्यता के अनुसार खजूरी गाँव को ‘पुरुष’ और बैकोना को ‘महिला’ स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि खजूरी में होली एक दिन पहले मनाई जाती है और बैकोना में उसके अगले दिन। ग्रामीणों का दृढ़ विश्वास है कि यदि इस क्रम को बदला गया, तो गाँव पर कोई बड़ी विपत्ति आ सकती है। इसी तरह सेमराकला गाँव में भी नियत तिथि से एक दिन पूर्व ही होली मना ली जाती है, ताकि पूर्वजों द्वारा स्थापित परंपरा और मर्यादा बनी रहे।
एक माह तक मांदर की थाप पर गूँजते हैं ‘फाग’ गीत
सरगुजा के कंवर समाज में होली का उत्साह फाल्गुन मास के पहले दिन से ही शुरू हो जाता है। पूरे एक महीने तक गाँव-गाँव में झांझ, मंजीरा और मांदर की थाप पर पारंपरिक होरी गीत गाए जाते हैं। इन गीतों में अक्सर राम-सीता के प्रसंग और प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन होता है। उत्सव की शुरुआत गाँव के बाहर सेमर की डाली गाड़कर ‘सम्मत’ (होलिका) भरने से होती है। गाँव का बैगा (पुजारी) विधि-विधान से पूजा कर अग्नि प्रज्वलित करता है, जिसमें सेमर की डाली को भक्त प्रह्लाद और आसपास की लकड़ियों को होलिका का प्रतीक माना जाता है।
होलिका की राख: असाध्य रोगों की औषधि और उर्वरता का प्रतीक
जनजातीय समाज में होलिका दहन की राख को केवल अवशेष नहीं, बल्कि दैवीय औषधि माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस राख को शरीर पर मलने से ज्वर, खसरा और त्वचा संबंधी बीमारियाँ जैसे खाज-खुजली दूर हो जाती हैं। लोग इस पवित्र राख को अपने खेतों में भी छिड़कते हैं और फलहीन वृक्षों की जड़ों में डालते हैं। उनका विश्वास है कि ऐसा करने से भूमि की उर्वरता बढ़ती है और आने वाली फसल कीट-पतंगों के प्रकोप से सुरक्षित रहती है। राख का यह उपयोग विज्ञान और लोक-विश्वास के अद्भुत मेल को दर्शाता है।

‘धूर उड़ाना’ और नदी स्नान की पवित्र परंपरा
होलिका दहन के अगले दिन ‘धूर उड़ाना’ की रस्म निभाई जाती है, जिसमें ग्रामीण राख और धूल उड़ाकर खुशियां मनाते हैं। इसके बाद ही असली रंगोत्सव की शुरुआत होती है। रंगों से सराबोर होने के बाद पूरा गाँव सामूहिक रूप से पास की नदी या जलस्रोत पर जाकर स्नान करता है। यह नदी स्नान केवल शरीर की शुद्धि नहीं, बल्कि मन की कड़वाहट को धोकर नए सिरे से सामाजिक संबंधों को मजबूत करने का प्रतीक है। इसके बाद ग्रामीण एक-दूसरे के घर जाकर बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते हैं और पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लेते हैं।
साहित्यकार अजय चतुर्वेदी की दृष्टि में सामाजिक सौहार्द की मिसाल
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी स्मृति पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात साहित्यकार अजय कुमार चतुर्वेदी ने अपने शोध में सरगुजा की इस होली को सामाजिक एकता का स्तंभ बताया है। उनके अनुसार गोंड, उरांव, कोरवा और पंडो जैसी तमाम जनजातियां अपनी विशिष्ट मान्यताओं के बावजूद इस पर्व को एक साथ मिलकर मनाती हैं। वे कहते हैं कि सरगुजा की होरी सामाजिक समरसता, प्रकृति के प्रति अगाध सम्मान और लोक-कलाओं के संरक्षण का जीवंत उदाहरण है। यह त्योहार आज भी आधुनिकता के दबाव के बीच अपनी मौलिकता और सामुदायिक सौहार्द को बचाने में कामयाब रहा है।
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