
रायपुर, भिलाई और बिलासपुर जैसे शहरों में अब युवाओं के बीच नौकरी को लेकर पुरानी सोच तेजी से बदल रही है। छत्तीसगढ़ का नया दौर अब एक ही दफ्तर में दशकों तक टिके रहने के बजाय ‘लिली पैडिंग’ (Lily Padding) जैसे नए तरीके अपना रहा है। प्रदेश के युवा अब अपनी तरक्की के लिए तालाब में तैरने वाले मेंढक की तरह एक पत्ते से दूसरे पत्ते पर छलांग लगा रहे हैं। राज्य में आईटी, स्टार्टअप और सर्विस सेक्टर के बढ़ते दायरे ने इस ट्रेंड को और हवा दी है। युवाओं का मानना है कि आज के दौर में कंपनी के प्रति वफादारी से ज्यादा जरूरी अपने खुद के करियर का विकास है।
क्या है यह लिली पैडिंग और युवाओं को क्यों लुभा रही है
लिली पैडिंग का सीधा मतलब है अपनी वर्तमान नौकरी को एक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करना। यह सामान्य जॉब हॉपिंग से थोड़ी अलग है क्योंकि इसमें युवा हड़बड़ी में काम नहीं छोड़ते। वे मौजूदा कंपनी में रहते हुए नई बारीकियां और स्किल्स सीखते हैं। जैसे ही उन्हें किसी दूसरी कंपनी से बेहतर पैकेज या बड़ी जिम्मेदारी का ऑफर मिलता है, वे वहां शिफ्ट हो जाते हैं। भिलाई के आईटी प्रोफेशनल्स का कहना है कि एक ही जगह कई सालों तक काम करने से सैलरी में वह बढ़त नहीं मिलती जो एक बार कंपनी बदलने से मिल जाती है। यही वजह है कि युवा अब कंफर्ट जोन से बाहर निकलकर जोखिम लेना पसंद कर रहे हैं।
सैलरी में भारी उछाल और वर्क कल्चर का अनुभव
छत्तीसगढ़ के स्थानीय बाजार में इस ट्रेंड का सबसे बड़ा असर वेतन पर दिख रहा है। लिली पैडिंग अपनाने वाले युवाओं को हर नई नौकरी के साथ 20 से 40 प्रतिशत तक का इंक्रीमेंट आसानी से मिल रहा है। इसके अलावा अलग-अलग संस्थानों में काम करने से उन्हें नए वर्क कल्चर और मल्टी-टास्किंग होने का मौका मिलता है। रायपुर के एचआर एक्सपर्ट्स बताते हैं कि आज की पीढ़ी अपने करियर को लेकर बहुत ज्यादा फोकस्ड है। उन्हें पता है कि बाजार की जरूरतों के हिसाब से खुद को ढालकर ही वे कॉम्पिटिशन में टिके रह सकते हैं।
रेज्यूमे पर अनस्टेबल होने का दाग और विश्वसनीयता की कमी
तेजी से नौकरी बदलने का सबसे बड़ा नुकसान आपकी साख पर पड़ता है। अगर कोई युवा हर छह या आठ महीने में अपनी कंपनी बदलता है तो उसके रेज्यूमे पर ‘जॉब हॉपर’ का ठप्पा लग जाता है। छत्तीसगढ़ की कई बड़ी और प्रतिष्ठित कंपनियां ऐसे उम्मीदवारों को नौकरी पर रखने से कतराती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह व्यक्ति उनके पास भी ज्यादा समय तक नहीं टिकेगा। कंपनियों को डर रहता है कि कर्मचारी की ट्रेनिंग और उसे सिखाने पर किया गया सारा खर्चा बेकार चला जाएगा।
पांच साल का नियम और ग्रेच्युटी का बड़ा आर्थिक नुकसान
लगातार नौकरी बदलने के चक्कर में युवा अपने कई वित्तीय लाभों को दांव पर लगा देते हैं। कानून के मुताबिक किसी भी निजी या सरकारी संस्थान में लगातार पांच साल काम करने पर ही कर्मचारी ग्रेच्युटी का हकदार होता है। लिली पैडिंग के चक्कर में युवा इस बड़ी एकमुश्त राशि को खो देते हैं। इसके साथ ही बार-बार पीएफ अकाउंट का ट्रांसफर करवाना और ईपीएफओ पोर्टल की तकनीकी दिक्कतों का सामना करना एक अलग मुसीबत बन जाता है। पुराने और अनुभवी जानकारों का मानना है कि आर्थिक सुरक्षा के लिहाज से किसी एक जगह लंबे समय तक टिकना ज्यादा फायदेमंद रहता है।
प्रोफेशनल नेटवर्किंग और मजबूत संबंधों में आती है दरार
जब आप किसी कंपनी में बहुत कम समय बिताते हैं तो वहां के साथियों और सीनियर अधिकारियों के साथ आपके गहरे संबंध नहीं बन पाते। करियर में आगे बढ़ने के लिए एक मजबूत प्रोफेशनल नेटवर्क का होना बहुत जरूरी है। बार-बार छलांग लगाने वाले युवाओं के साथ अक्सर यह होता है कि उनके पास भरोसेमंद सहकर्मियों की कमी हो जाती है। जब भविष्य में उन्हें किसी बड़ी कंपनी में रेफरेंस की जरूरत पड़ती है तो उनके पास ऐसे लोग नहीं होते जो उनकी कार्यक्षमता की गारंटी ले सकें।
मानसिक तनाव और बार-बार नए माहौल में ढलने की चुनौती
हर नई नौकरी अपने साथ नई जिम्मेदारियां और नया माहौल लेकर आती है। बार-बार कंपनी बदलने का मतलब है कि आपको हर बार नए सिरे से खुद को साबित करना होगा। नए सहकर्मियों के साथ तालमेल बिठाना और नए सिस्टम को समझना मानसिक रूप से थकाने वाला हो सकता है। जानकारों की सलाह है कि युवाओं को छलांग लगाने से पहले अपनी मानसिक शांति और करियर के लंबे लक्ष्यों के बारे में जरूर सोचना चाहिए।



