
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में मानदेय वृद्धि की मांग को लेकर रसोईया संघ अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चला गया है। इस विरोध प्रदर्शन का सीधा असर सरकारी स्कूलों की व्यवस्था पर पड़ रहा है। रसोइयों के काम पर न लौटने के कारण अब शिक्षकों के कंधों पर दोहरी जिम्मेदारी आ गई है। बच्चों को भविष्य संवारने का पाठ पढ़ाने वाले गुरुजी अब स्कूलों के किचन में दाल-चावल पकाते नजर आ रहे हैं। प्रशासन की ओर से कोई वैकल्पिक व्यवस्था न होने के कारण जिले के कई विकासखंडों में शिक्षा का स्तर बुरी तरह प्रभावित हो रहा है और शिक्षक बेबस नजर आ रहे हैं।

मजबूरन मान रहे विभागीय आदेश: पढ़ाएं या खाना बनाएं?
लखनपुर विकासखंड के सुदूर वनांचल ग्राम अरगोती, तपता और मुड़ापारा जैसे इलाकों में इन दिनों अजीब नजारा है। सरकारी आदेश है कि रसोइया आए या न आए, बच्चों को मध्यान्ह भोजन (मिड-डे मील) हर हाल में मिलना चाहिए। इस आदेश के पालन के फेर में शिक्षक सुबह से ही पढ़ाई छोड़कर रसोई की तैयारी में जुट जाते हैं। शिक्षकों का कहना है कि वे विभागीय निर्देशों के बंधे हुए हैं, लेकिन इस प्रक्रिया में उनका कीमती समय बच्चों को पढ़ाने के बजाय सब्जियां काटने और चूल्हा जलाने में निकल रहा है।

पढ़ाई पर पड़ रहा सीधा असर: बच्चों का भविष्य दांव पर
जब स्कूल के प्रधान पाठक और सहायक शिक्षक खुद खाना बनाने में व्यस्त होंगे, तो कक्षाओं में बच्चों को कौन संभालेगा? तपता माध्यमिक शाला के प्रधान पाठक राजेश कुमार गौतम और प्राथमिक शाला मुड़ापारा के प्रधान पाठक कृष्णा ने अपनी व्यथा साझा करते हुए बताया कि कई दिनों से पढ़ाई का काम ठप पड़ा है। शिक्षकों के अनुसार, ग्राम स्तर या प्रशासन की ओर से भोजन बनाने के लिए कोई दूसरी व्यवस्था नहीं की गई है। ऐसे में बच्चों को भूखा भी नहीं छोड़ा जा सकता, जिसका खामियाजा उनकी शिक्षा को भुगतना पड़ रहा है।
मानदेय को लेकर आर-पार की जंग: रसोइयों ने खींचे हाथ
मध्यान्ह भोजन की जिम्मेदारी महिला समूहों के पास है, जबकि खाना बनाने का काम रसोइया करते हैं। रसोइयों का कहना है कि वर्तमान में मिलने वाला मानदेय महंगाई के दौर में ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। लंबे समय से मानदेय बढ़ाने की गुहार लगाने के बाद जब कोई सुनवाई नहीं हुई, तो उन्होंने सामूहिक हड़ताल का रास्ता चुना। रसोइयों के काम बंद करने से पूरी कमान अब शिक्षकों पर आ टिकी है। शिक्षकों का तर्क है कि वे शिक्षक हैं न कि रसोइया, लेकिन बच्चों की भूख और सरकारी दबाव के बीच वे पिस रहे हैं।

प्रशासन की बेरुखी से नाराजगी: नहीं हो रही कोई वैकल्पिक व्यवस्था
हड़ताल शुरू हुए कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन अब तक प्रशासन ने स्कूलों में भोजन बनाने के लिए कोई ठोस इंतजाम नहीं किए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी खराब है जहां संसाधनों की पहले से ही कमी है। शिक्षकों का कहना है कि यदि सरकार रसोइयों की मांगें नहीं मानती है या कोई वैकल्पिक कर्मचारी नियुक्त नहीं करती, तो आने वाले दिनों में स्कूलों में ताला लगाने की नौबत आ सकती है। अभिभावक भी इस स्थिति से चिंतित हैं क्योंकि उनके बच्चों का शैक्षणिक सत्र खराब हो रहा है।

चूल्हे-चौके में उलझे ‘गुरुजी’: कब सुधरेंगे हालात?
फिलहाल सरगुजा के वनांचल क्षेत्रों के शिक्षक हाथ में चाक और डस्टर की जगह कलछी और कड़ाही थामे नजर आ रहे हैं। इस संकट ने राज्य की शिक्षा और पोषण योजना के बीच के तालमेल की पोल खोल दी है। शिक्षकों ने स्पष्ट किया है कि वे इस अतिरिक्त काम से बेहद परेशान हैं और कई प्रकार की व्यावहारिक समस्याओं का सामना कर रहे हैं। अब सबकी नजरें शासन पर टिकी हैं कि क्या रसोइयों की मांगें पूरी की जाएंगी या फिर शिक्षकों को इसी तरह रसोई संभालनी होगी।



