हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: कोटवार का पद बाप-दादा की जागीर नहीं, नियुक्ति में अब काबिलियत और चरित्र ही सर्वोपरि

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कोटवारों की नियुक्ति को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल कायम की है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि कोटवार का पद कोई खानदानी विरासत नहीं है, जिसे पिता के बाद पुत्र को अधिकार के रूप में सौंप दिया जाए। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह एक सरकारी और सांविधिक पद है, न कि कोई निजी संपत्ति। अदालत ने जोर देकर कहा कि किसी पूर्व कोटवार के रिश्तेदार होने का फायदा केवल तभी मिल सकता है, जब दो उम्मीदवारों की योग्यता पूरी तरह बराबर हो।

विरासत नहीं, योग्यता है पैमाना

यह पूरा विवाद बेमेतरा जिले के नवागढ़ तहसील स्थित ग्राम गनियारी से शुरू हुआ था। वहां के कोटवार खेलनदास पनिका की मृत्यु के बाद उनके बेटे परदेशी राम ने इस पद पर अपना दावा ठोका था। उनका मुकाबला गांव के ही रामबिहारी साहू से था। राजस्व अधिकारियों ने योग्यता के आधार पर रामबिहारी को चुन लिया, जिसे परदेशी राम ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अदालत ने याचिका खारिज करते हुए साफ किया कि छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 के तहत यह पद नियमों से बंधा है और इसमें ‘वंशानुगत हक’ जैसी कोई जगह नहीं है।

उम्र और शिक्षा ने पलटा पासा

कोर्ट ने नियुक्ति की प्रक्रिया को सही ठहराते हुए उम्र और शैक्षणिक स्तर के अंतर को भी महत्वपूर्ण माना। याचिका के समय परदेशी राम की उम्र 54 साल थी और कोटवार की रिटायरमेंट आयु 60 वर्ष है, यानी उनके पास सेवा के लिए मात्र 6 साल बचे थे। इसके उलट, नियुक्त किए गए रामबिहारी साहू महज 34 वर्ष के थे, जो लंबी सेवा के लिए अधिक फिट पाए गए। साथ ही, परदेशी राम जहां केवल तीसरी तक पढ़े थे, वहीं रामबिहारी पांचवीं पास थे। कोर्ट ने माना कि बेहतर शिक्षा सरकारी कामकाज को समझने और निभाने में मददगार होती है।

दागी चरित्र पर लगा अड़ंगा

नियुक्ति रुकने का एक बड़ा कारण परदेशी राम का पुलिस रिकॉर्ड भी बना। पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक, उनके खिलाफ अतीत में शांति भंग करने के मामले दर्ज थे। कोटवार नियम-2 का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि इस पद के लिए उम्मीदवार का चरित्र निष्कलंक होना अनिवार्य है। चूंकि कोटवार गांव और पुलिस के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी होता है, इसलिए किसी भी दागी छवि वाले व्यक्ति को यह जिम्मेदारी नहीं सौंपी जा सकती।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का जिक्र करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत अदालत का काम केवल यह देखना है कि प्रशासन ने फैसला लेने की प्रक्रिया में नियमों का पालन किया है या नहीं। हाईकोर्ट ने राजस्व मंडल और कमिश्नर के आदेश को बिल्कुल जायज माना। पीठ ने अंत में दोहराया कि सरकारी पदों को वारिसों को सौंपने की पुरानी परंपरा अब कानूनन मान्य नहीं है, और केवल ‘निकट संबंधी’ होना नियुक्ति की गारंटी नहीं हो सकता।

Also Read: बिना सरकारी मदद…महिला सरपंच की अनोखी पहल: बेटी के जन्म पर अपनी जेब से दे रहीं 2100 रुपये, बदल रही है गांव की तस्वीर

दक्षिण कोसल का Whatsapp Group ज्वाइन करे

Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

Related Articles

Back to top button