
छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में शहरी विकास के नाम पर एक ऐसा खेल खेला गया है, जिसने नगर निगम से लेकर टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग तक की साख को कटघरे में खड़ा कर दिया है। शहर में नियमों को ताक पर रखकर करोड़ों के ‘नक्शा घोटाले’ का पर्दाफाश हुआ है। दस्तावेजों की पड़ताल में सामने आया है कि अज्ञेय नगर जैसे प्राइम लोकेशन पर एक बड़े आवासीय प्रोजेक्ट में जमकर हेराफेरी की गई। बिल्डर और रसूखदारों ने अफसरों के साथ मिलकर न केवल मास्टर प्लान की धज्जियां उड़ाईं, बल्कि कागजों पर फर्जीवाड़ा कर सरकार को भी चूना लगाया।
अनंत रियाल्टी का कारनामा: 60 की जगह बना दिए 90 फ्लैट
मामला अनंत रियाल्टी के बैनर तले बन रहे एक प्रोजेक्ट से जुड़ा है। बिल्डर नमन गोयल द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार, शुरू में इस प्रोजेक्ट के लिए 4 मंजिलों पर कुल 60 फ्लैट बनाने का प्रस्ताव दिया गया था। लेकिन जब नक्शा पास होकर बाहर आया, तो वह जादुई तरीके से बदल गया। स्वीकृत नक्शे में फ्लैटों की संख्या बढ़कर 90 हो गई और मंजिलों की संख्या 4 से बढ़कर 6 पहुंच गई। जानकारों का कहना है कि यह कोई क्लर्क की गलती नहीं, बल्कि सोची-समझी साजिश है, क्योंकि इतनी बड़ी विसंगति बिना अधिकारियों की ‘हरी झंडी’ के मुमकिन नहीं है।
विकास सिंह: वो ‘मिस्टर इंडिया’ आर्किटेक्ट जिसने किया बड़ा खेल
इस घोटाले का सबसे सनसनीखेज पहलू ‘विकास सिंह’ नाम का आर्किटेक्ट है। दस्तावेजों में इसी नाम का इस्तेमाल कर सैकड़ों नक्शे जमा किए गए। लेकिन जब जांच टीम ने रिकॉर्ड खंगाला, तो पता चला कि बिलासपुर में इस नाम का कोई रजिस्टर्ड आर्किटेक्ट या इंजीनियर अस्तित्व में ही नहीं है। ताज्जुब की बात यह है कि इस ‘फर्जी’ नाम के आधार पर शहर में 400 से ज्यादा भवन नक्शे और लगभग 150 लेआउट पास कर दिए गए। सवाल यह उठता है कि नगर निगम के जिम्मेदार अफसर साल भर तक किस नींद में थे कि उन्होंने एक बार भी आर्किटेक्ट का रजिस्ट्रेशन नंबर चेक करने की जहमत नहीं उठाई?
गरीबों के हक पर डाका: EWS के नाम पर फर्जी शपथपत्र
नियमों के मुताबिक, किसी भी बड़े प्रोजेक्ट में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए जमीन या मकान आरक्षित करना अनिवार्य है। आरोप है कि बिल्डर ने तिफरा क्षेत्र की एक जमीन का हवाला देते हुए शपथपत्र दिया कि वहां गरीबों के लिए घर बनाए जाएंगे। लेकिन जब राजस्व रिकॉर्ड खंगाले गए, तो वह जमीन बिल्डर के नाम पर थी ही नहीं। यानी अफसरों को गुमराह कर और गरीबों के हक को कागजों पर ही मारकर यह ‘डेवलपमेंट परमिशन’ हासिल कर ली गई।
एक्सप्रेस अप्रूवल: एक ही दिन में पास कर दिए 29 लेआउट
जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि विभाग में कुछ फाइलें ‘बुलेट ट्रेन’ की रफ्तार से दौड़ीं। रिकॉर्ड के अनुसार, एक ही दिन में 29 लेआउट फाइलों को मंजूरी दे दी गई। शहरी नियोजन के विशेषज्ञों के मुताबिक, एक लेआउट फाइल के भौतिक सत्यापन और तकनीकी परीक्षण में कम से कम 2 से 3 दिन का समय लगता है। ऐसे में 29 फाइलों का एक ही दिन में क्लियर होना इस बात की तस्दीक करता है कि विभाग के भीतर फाइलों को आंख बंद कर साइन करने का एक संगठित नेटवर्क सक्रिय था।
मास्टर प्लान की अनदेखी और रसूख का दबाव
बिलासपुर के मास्टर प्लान को इस प्रोजेक्ट के जरिए सीधे तौर पर चुनौती दी गई है। जिस क्षेत्र में जितनी ऊंचाई की अनुमति थी, उससे कहीं अधिक निर्माण की अनुमति दे दी गई। अज्ञेय नगर जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्र में इस तरह के अवैध निर्माण से न केवल ट्रैफिक का दबाव बढ़ेगा, बल्कि भविष्य में सीवरेज और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं का भी संकट खड़ा हो जाएगा। स्थानीय लोगों का आरोप है कि रसूख और पैसे के दम पर सरकारी तंत्र को पूरी तरह से पंगु बना दिया गया।
करोड़ों की बंदरबांट और लेनदेन की आशंका
विशेषज्ञों का अनुमान है कि जिस पैमाने पर 400 नक्शे और 150 लेआउट पास हुए हैं, उसमें करोड़ों रुपये की बंदरबांट हुई होगी। एक एकड़ के लेआउट को अवैध रूप से पास कराने के लिए बाजार में लाखों के रेट तय होने की चर्चा है। इस घोटाले के उजागर होने के बाद बिलासपुर के रियल एस्टेट कारोबार में हड़कंप मच गया है। जो लोग ईमानदारी से काम कर रहे हैं, उनका कहना है कि इस तरह के घोटालों से न केवल विभाग की बदनामी होती है, बल्कि आम खरीदारों का भरोसा भी टूटता है।
स्वतंत्र जांच की मांग और जनता का आक्रोश
इस खुलासे के बाद सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों ने मोर्चा खोल दिया है। मुख्यमंत्री और नगर निगम कमिश्नर से मांग की जा रही है कि इस मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी या रिटायर्ड जज से कराई जाए। अगर एक फर्जी आर्किटेक्ट के नाम पर 400 नक्शे पास हुए हैं, तो उन सभी निर्माणों की वैधता पर सवाल खड़ा हो गया है। शहरवासियों का कहना है कि अगर इन अवैध निर्माणों पर बुलडोजर नहीं चला, तो भ्रष्टाचार की यह नींव और भी मजबूत हो जाएगी।
प्रशासन की चुप्पी और आगे की राह
फिलहाल, नगर निगम और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग के आला अधिकारी इस मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि अंदरूनी तौर पर फाइलों की री-चेकिंग शुरू कर दी गई है। आने वाले दिनों में कुछ बड़े अधिकारियों पर गाज गिरना तय माना जा रहा है। अगर जांच सही दिशा में आगे बढ़ी, तो कई रसूखदार बिल्डर भी कानून के शिकंजे में होंगे। बिलासपुर के इतिहास में यह अब तक का सबसे बड़ा ‘नक्शा घोटाला’ साबित हो सकता है।
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