
छत्तीसगढ़ के सुदूर दक्षिण में स्थित बस्तर अंचल अपनी अनूठी संस्कृति और घने जंगलों के साथ-साथ गहरी धार्मिक आस्था के लिए भी जाना जाता है। यहां दंतेवाड़ा जिले में स्थित मां दंतेश्वरी का मंदिर देश के प्रमुख 52 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के पार्थिव शरीर के टुकड़े किए थे, तब यहां उनका दांत गिरा था। इसी पावन घटना के कारण इस स्थान का नाम दंतेश्वरी पड़ा और यह करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र बन गया।
14वीं शताब्दी का इतिहास और काकतीय राजाओं की अटूट श्रद्धा
दंतेश्वरी मंदिर का निर्माण 14वीं शताब्दी में काकतीय वंश के राजाओं द्वारा कराया गया था। बस्तर रियासत के शासक देवी दंतेश्वरी को अपनी कुलदेवी मानते थे और आज भी राजपरिवार के सदस्य प्रमुख त्योहारों पर यहां विशेष पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं। यह मंदिर शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम पर स्थित है, जो इसकी सुंदरता और पवित्रता को और बढ़ा देता है। ऐतिहासिक रूप से यह मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं बल्कि बस्तर की रियासत और वहां के आदिवासियों के गौरवशाली इतिहास का प्रतीक है।
वास्तुकला की भव्यता और चार भागों में बंटा मंदिर परिसर
शिल्पकला की दृष्टि से यह मंदिर प्राचीन भारतीय स्थापत्य का एक शानदार नमूना पेश करता है। मंदिर की संरचना को चार मुख्य हिस्सों में बांटा गया है जिसमें गर्भगृह, महामंडप, मुख्यमंडप और सभामंडप शामिल हैं। गर्भगृह के भीतर माता की प्रतिमा काले पत्थर से तराशी गई है, जिसके दर्शन मात्र से भक्तों को शांति की अनुभूति होती है। मंदिर के प्रवेश द्वार के ठीक सामने एक विशाल गरुड़ स्तंभ स्थापित है, जो अपनी ऊंचाई और नक्काशी से पर्यटकों को आकर्षित करता है। मंदिर के शिखर पर बनी आकृतियां उस दौर के कलाकारों की कुशलता को दर्शाती हैं।
विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा और जनजातीय संस्कृति का संगम
बस्तर की पहचान यहां के दशहरे से है जो दुनिया में सबसे लंबे समय तक चलने वाला उत्सव माना जाता है। इस उत्सव का मुख्य केंद्र मां दंतेश्वरी का मंदिर ही होता है। नवरात्रि और दशहरे के दौरान आसपास के सैकड़ों गांवों से आदिवासी ग्रामीण अपनी पारंपरिक टोलियों के साथ यहां पहुंचते हैं। इस दौरान देवी की पालकी निकाली जाती है और भव्य शोभायात्रा का आयोजन होता है। यह नजारा इतना दिव्य होता है कि इसे देखने के लिए देश-दुनिया से पर्यटक बस्तर खींचे चले आते हैं। आदिवासियों के लिए यह आयोजन उनकी परंपरा को जीवित रखने का सबसे बड़ा जरिया है।
नवरात्रि में ज्योति कलश और पर्यटन के नए आयाम
नवरात्रि के पावन दिनों में मंदिर परिसर हजारों ज्योति कलशों की रोशनी से जगमगा उठता है। दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामना पूरी होने की उम्मीद में दीप प्रज्वलित करते हैं। बदलते समय के साथ अब शासन की ओर से भी यहां पर्यटन सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है। सड़कों की बेहतर कनेक्टिविटी और रुकने की अच्छी व्यवस्था होने के कारण अब दंतेवाड़ा केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख टूरिस्ट स्पॉट भी बन गया है। आस्था, इतिहास और प्राकृतिक खूबसूरती का ऐसा मेल कम ही देखने को मिलता है।



