Chhattisgarh 36 Devi Temples: छत्तीसगढ़ की 36 देवियों के पवित्र दरबार, जानिए हर मंदिर से जुड़ी हैं अनोखी पौराणिक मान्यताएं

36 Devi Temples In Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और धार्मिक धरा को ऐतिहासिक रूप से 36 गढ़ों का क्षेत्र माना जाता है, जहां नवरात्रि के पवित्र पर्व पर माता रानी के जयकारों से पूरा वातावरण गूंज उठता है। प्रदेश के कोने-कोने में स्थित इन पावन शक्तिपीठों और देवी मंदिरों में भक्तों की अटूट आस्था देखने को मिलती है। इस विशेष आलेख में हम छत्तीसगढ़ के उन्हीं प्रमुख 36 देवी मंदिरों के बारे में विस्तार से जानेंगे, जिनकी महिमा दूर-दूर तक फैली हुई है।

Table of Contents

1. मां बम्लेश्वरी देवी मंदिर, डोंगरगढ़

राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ में ऊंची पहाड़ी पर स्थित मां बम्लेश्वरी का यह मंदिर छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े और प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। इस ऐतिहासिक मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों के अलावा आधुनिक रोपवे की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है। नवरात्रि के विशेष अवसरों पर यहां देश के कोने-कोने से लाखों श्रद्धालु एकत्र होकर माता की आराधना करते हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में एक भव्य और जीवंत मेले का माहौल बन जाता है।

2. मां करेला भवानी, राजनांदगांव

भंडारपुर गांव के वनांचल में स्थित मां करेला भवानी के इस मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को करीब नौ सौ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। इन सीढ़ियों के दोनों तरफ फैली प्राकृतिक हरियाली और पेड़-पौधे आने वाले पर्यटकों का मन मोह लेते हैं। पहाड़ी के ठीक नीचे एक सुंदर भवानी तालाब स्थित है, जहां पारंपरिक रूप से स्नान करने के बाद भक्तजन माता के दर्शन के लिए ऊपर चढ़ाई करते हैं।

3. मां पाताल भैरवी मंदिर, राजनांदगांव

राजनांदगांव शहर के बीच स्थित यह मंदिर अपनी अनूठी और भव्य वास्तुकला के लिए पूरे राज्य में प्रसिद्ध है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां माता की मुख्य प्रतिमा पाताल यानी जमीन के ठीक नीचे गर्भगृह में स्थापित है। इस मंदिर की दूसरी मंजिल पर त्रिपुर सुंदरी और नवदुर्गा की विधिवत पूजा की जाती है, जबकि तीसरी मंजिल पर भगवान शिव और बारह ज्योतिर्लिंगों के सुंदर प्रतिरूप स्थापित किए गए हैं।

4. चंडी माता मंदिर, महासमुंद

महासमुंद जिले के बागबाहरा विकासखंड के अंतर्गत आने वाले घुंचपाली गांव में यह चंडी माता मंदिर अत्यंत श्रद्धा का केंद्र है। यहां लगभग तेईस फीट ऊंची एक विशाल स्वयंभू पत्थर की मूर्ति स्थापित है, जिसके बारे में स्थानीय लोगों का मानना है कि वह समय के साथ आकार में बढ़ती जा रही है। मंदिर के दक्षिणमुखी स्वरूप और चारों तरफ फैले हुए शांत जंगल इसकी अलौकिक आभा को और अधिक बढ़ाते हैं, जहां कई बार जंगली भालुओं का पहुंचना भी लोगों द्वारा चमत्कार माना जाता है।

5. बंजारी माता मंदिर, रायपुर

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के व्यस्त बिलासपुर मार्ग पर रावांभाठा गांव के समीप स्थित बंजारी माता मंदिर एक लोकप्रिय और जागृत धार्मिक स्थल है। यह पावन स्थान स्वयंभू माता की असीम शक्ति का प्रतीक माना जाता है, और बुजुर्गों के अनुसार यह मूर्ति करीब पांच सौ साल पहले बंजर भूमि से स्वतः प्रकट हुई थी तथा धीरे-धीरे इसका आकार बढ़ता गया। इस परिसर में भगवान विष्णु, शिव, गणेश और हनुमान जी के अन्य उप-मंदिर भी बने हुए हैं, जो इसकी भव्यता को बढ़ाते हैं।

6. महामाया मंदिर, रायपुर

रायपुर शहर की पुरानी बस्ती के हृदय स्थल पर स्थित श्री राजराजेश्वरी महामाया मंदिर एक बेहद प्राचीन और ऐतिहासिक धरोहर है। यह पवित्र मंदिर जगत जननी देवी महामाया को समर्पित है, जिन्हें सनातन परंपरा में भगवान शिव और विष्णु का संयुक्त स्वरूप माना जाता है। लगभग चौदह सौ साल पुराने इस मंदिर का निर्माण ऐतिहासिक हैहयवंशी राजाओं के शासनकाल में कराया गया था, और इसकी अद्भुत वास्तुकला आज भी लोगों को आकर्षित करती है।

7. मां दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा

बस्तर संभाग के दंतेवाड़ा जिले में शंखिनी और डंकिनी नदियों के पवित्र संगम के पास स्थित यह मंदिर देश के बावन शक्तिपीठों में अपना विशेष स्थान रखता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यहां माता सती का दांत गिरा था, जिसके कारण इस क्षेत्र का नाम दंतेवाड़ा पड़ा। यह स्थान तांत्रिक साधना, आदिवासी संस्कृति और ऐतिहासिक परंपराओं का एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है, जहाँ दर्शन के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।

8. मावली माता मंदिर, धमतरी

धमतरी जिले के अंतर्गत आने वाले पुरुर गांव में स्थित यह मावली माता मंदिर अपनी विशिष्ट और कड़ी पारंपरिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है। इस स्थान की विशेष परंपरा के तहत गर्भगृह में महिलाओं का प्रवेश वर्जित रखा गया है। शारदीय और चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व पर यहां कुल एक सौ छियासट भव्य ज्योतियां प्रज्वलित की जाती हैं, जिन्हें देखने और माता का आशीर्वाद लेने के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं।

9. चंडी देवी मंदिर, बिरकोनी

महासमुंद जिले के बिरकोनी गांव में स्थापित यह सिद्ध शक्तिपीठ एक स्वयंभू देवी स्थल के रूप में क्षेत्रभर में प्रसिद्ध है। किंवदंतियों के अनुसार मां दुर्गा ने स्वयं इस स्थान पर अपना स्थाई वास स्थापित किया था, जिससे इसकी पवित्रता और मान्यता बहुत अधिक बढ़ जाती है। नवरात्रि के विशेष दिनों में यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए लगातार चौबीस घंटे खुला रहता है और यहाँ दिन-रात भक्तों का तांता लगा रहता है।

10. खल्लारी माता मंदिर, महासमुंद

महासमुंद जिला मुख्यालय से लगभग चौबीस किलोमीटर की दूरी पर ऊंचे पहाड़ों की चोटी पर यह मंदिर स्थापित है। इस प्राचीन स्थल पर आने वाले भक्तजन विशेष रूप से अपनी सूनी गोद भरने और संतान सुख की मनोकामना लेकर पहुंचते हैं। नवरात्रि के दिनों में इन पहाड़ियों पर श्रद्धा और भक्ति का एक अलग ही सैलाब उमड़ पड़ता है, जहाँ हजारों भक्त अपनी मन्नत पूरी होने पर मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित करते हैं।

11. मां चंद्रहासिनी मंदिर, जांजगीर-चांपा

जांजगीर-चांपा जिले के चंद्रपुर कस्बे में पवित्र महानदी के पावन तट पर स्थित यह मंदिर छत्तीसगढ़ के सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। नवरात्रि के पावन अवसरों पर यहां आसपास के राज्यों से भी बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है, जिससे पूरा कस्बा और नदी घाट पूरी तरह से भक्तिमय और ऊर्जावान वातावरण में तब्दील हो जाता है।

12. नाथल दाई मंदिर, चंद्रपुर

यह रमणीय नाथल दाई मंदिर चंद्रपुर में चंद्रहासिनी माता मंदिर के बिल्कुल समीप ही महानदी के तट पर दो नदियों के संगम स्थल के पास स्थित है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यदि कोई भी सच्चा भक्त पूरी श्रद्धा के साथ नाथल दाई के दर्शन मात्र कर लेता है, तो उसके जीवन के सभी पुराने पाप और कष्ट नष्ट हो जाते हैं। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य पर्यटकों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है।

13. सिद्धि माता मंदिर, बेमेतरा

सिद्धि माता का यह प्रसिद्ध मंदिर छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के अंतर्गत आने वाले ग्राम संडी (बेरला ब्लॉक) में स्थित एक ऐतिहासिक और सुंदर धार्मिक स्थल है। यह पवित्र स्थान जिला मुख्यालय बेमेतरा से लगभग पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर पावन शिवनाथ नदी के किनारे स्थापित है और आसपास के ग्रामीण अंचलों के लोगों के बीच अटूट आस्था और विश्वास का बड़ा केंद्र माना जाता है।

14. रतनपुर महामाया मंदिर, बिलासपुर

ऐतिहासिक नगरी बिलासपुर के पास रतनपुर में स्थित मां महामाया देवी का यह भव्य मंदिर देश के प्रमुख शक्तिपीठों में शुमार है। यहां माता रानी को स्थानीय भाषा में आदर के साथ कोशलेश्वरी के रूप में भी पुकारा जाता है। इस प्राचीन नगर का पूरा परिवेश साल भर एक गहरी धार्मिक और आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से भरा रहता है, जो आने वाले हर पर्यटक और श्रद्धालु को मंत्रमुग्ध कर देता है।

15. मरही माता मंदिर, बिलासपुर

बिलासपुर जिले के घने जंगलों के बीच भनवारटंक रेलवे स्टेशन के पास स्थित यह मरही माता का मंदिर अपनी शांति और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। यह स्थल शहरी कोलाहल से दूर प्रकृति के अगदी करीब बसा हुआ है। नवरात्रि के दौरान यहां वनांचल के गांवों से बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं और माता के चरणों में अपनी हाजिरी लगाकर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

16. माता अंगारमोती मंदिर, धमतरी

धमतरी जिले के वनांचल क्षेत्र में स्थित माता अंगारमोती का यह मंदिर मुख्य रूप से वन देवी और प्रकृति की रक्षक के रूप में समर्पित है। यह पावन स्थल अपनी गहरी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक महत्व के साथ-साथ प्राकृतिक पर्यटन के लिए भी एक बेहतरीन केंद्र बन चुका है। ग्रामीण परंपरा के अनुसार यहां के अनुष्ठान बहुत अनूठे होते हैं, जो स्थानीय संस्कृति की गहरी छाप छोड़ते हैं।

17. बिलाई माता मंदिर, धमतरी

धमतरी शहर के दक्षिणी हिस्से में स्थित यह प्रसिद्ध मंदिर मां विंध्यवासिनी के पावन स्वरूप और बिलाई माता के रूप में स्थानीय जनता के बीच बहुत प्रतिष्ठित है। चैत्र और क्वांर महीने के दोनों नवरात्र पर्वों के दौरान यहां भव्य धार्मिक उत्सवों का आयोजन किया जाता है, जिसमें हजारों की संख्या में स्थानीय नागरिक और दूर-दराज के श्रद्धालु पहुंचकर माता के दर्शन का लाभ उठाते हैं।

18. जतमाई मंदिर, गरियाबंद

गरियाबंद जिले में घने जंगलों, पहाड़ियों और कलकल बहते झरनों के बीच स्थित जतमाई मंदिर अपनी अद्वितीय प्राकृतिक सुंदरता के लिए पूरे प्रदेश में मशहूर है। विशेष रूप से वर्षा ऋतु और नवरात्रि के समय यहां पहाड़ों से गिरते झरनों का पानी और मंदिर का परिसर इतना मनमोहक हो जाता है कि देखने वाले पर्यटकों का दिल खुश हो जाता है और वे यहां बार-बार आना पसंद करते हैं।

19. घटारानी मंदिर, गरियाबंद

गरियाबंद जिले का यह प्रसिद्ध घटारानी मंदिर एक शांत पहाड़ी की प्राकृतिक खोह के ठीक अंदर स्थित है। इस धार्मिक स्थल के पास ही एक बहुत सुंदर झरना और गहरा पवित्र कुंड मौजूद है, जो इस पूरे परिवेश को और अधिक आकर्षक बना देते हैं। इसके अतिरिक्त इस पावन परिसर में स्थापित घटेश्वरनाथ शिवलिंग की भी पूरे विधि-विधान के साथ नियमित पूजा-अर्चना की जाती है।

20. कुदरगढ़ी धाम, सूरजपुर

सूरजपुर जिले में लगभग पंद्रह सौ फीट की ऊंचाई पर स्थित एक विशाल पहाड़ की चोटी पर यह मंदिर मां बागेश्वरी को समर्पित है। इस प्राचीन धाम से स्थानीय बैगा जनजाति के लोगों की गहरी आस्था जुड़ी हुई है, जो पीढ़ियों से यहां पूरी निष्ठा के साथ पूजा-पाठ करते आ रहे हैं। नवरात्रि के अवसर पर यहां लगने वाले मेले की रौनक देखने लायक होती है।

21. महामाया मंदिर, सूरजपुर

सूरजपुर जिले के अंतर्गत आने वाले देवीपुर गांव में स्थित यह महामाया मंदिर क्षेत्र के सबसे प्राचीन और पूजनीय मंदिरों में से एक माना जाता है। नवरात्रि के पावन दिनों में इस मंदिर परिसर में एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें आसपास के दर्जनों गांवों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु पैदल यात्रा करके माता के दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं।

22. खुड़िया रानी देवी मंदिर, जशपुर

जशपुर जिले के बगीचा जनपद क्षेत्र में लगभग तीन हजार फीट की अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर पहाड़ी कोरवा जनजाति की कुलदेवी को समर्पित है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसके गर्भगृह की गुफा से निरंतर बहने वाली पवित्र जलधारा है, जो यहां आने वाले हर एक श्रद्धालु को एक असीम मानसिक शांति और आध्यात्मिक संतोष प्रदान करती है।

23. मड़वारानी मंदिर, कोरबा

कोरबा और जांजगीर-चांपा जिलों की सीमा के बीच स्थित इस प्रसिद्ध मंदिर से एक बहुत ही रोचक लोककथा जुड़ी है कि देवी ने अपना विवाह मंडप बीच में ही छोड़कर इस शांत पहाड़ को अपना स्थाई निवास बना लिया था। नवरात्रि के पवित्र पर्व पर यहां दूर-दराज से आने वाले भक्तों द्वारा बड़ी संख्या में मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित किए जाते हैं, जिनकी देखरेख बहुत श्रद्धा से होती है।

24. मां सियादेवी मंदिर, बालोद

छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में स्थित यह मां सियादेवी का मंदिर भगवान राम की अर्धांगिनी माता सीता से जुड़ी कई महत्वपूर्ण पौराणिक कथाओं के लिए बहुत प्रसिद्ध है। त्रेतायुग काल से जुड़ी हुई इस पावन स्थल की मान्यताएं और किंवदंतियां यहां के धार्मिक महत्व को और अधिक बढ़ा देती हैं, जिसके कारण साल भर यहां पर्यटकों और श्रद्धालुओं का आना-जाना बना रहता है।

25. गंगा मइया मंदिर, बालोद

बालोद जिले के झलमला क्षेत्र में स्थित यह ऐतिहासिक गंगा मइया मंदिर अंग्रेजों के शासनकाल के समय से जुड़ी रोचक कथाओं और चमत्कारों के लिए जाना जाता है। लगभग एक सौ तीस साल पुराना यह प्रतिष्ठित धार्मिक स्थल आज भी छत्तीसगढ़ के आम जनमानस की अटूट आस्था और विश्वास का एक बहुत बड़ा और जीवंत केंद्र बना हुआ है, जहाँ हर मनोकामना पूरी होती है।

26. मां गंगई मंदिर, कवर्धा

कवर्धा जिले में स्थित यह मां गंगई का मंदिर अपनी एक बेहद अनोखी और प्राचीन परंपरा के लिए पूरे संभाग में जाना जाता है। इस मंदिर में नवरात्रि के दौरान तृतीया तिथि से ही विशेष मनोकामना ज्योति प्रज्ज्वलित करने की परंपरा है। इसके ठीक पास में बनी हुई प्राचीन बावली अपनी उत्कृष्ट वास्तुकला का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करती है, जो इतिहास प्रेमियों को भी आकर्षित करती है।

27. अष्टभुजी माता मंदिर, जांजगीर-चांपा

जांजगीर-चांपा जिले के ऐतिहासिक अड़भार गांव में स्थापित यह अष्टभुजी माता का मंदिर पुरातात्विक और धार्मिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। नवरात्रि के पावन पर्व के दौरान इस प्राचीन मंदिर परिसर में भक्तों का एक विशाल सैलाब उमड़ पड़ता है, जो माता के आठ भुजाओं वाले भव्य स्वरूप के दर्शन कर स्वयं को धन्य महसूस करते हैं।

28. भद्रकाली माता मंदिर, बेमेतरा

बेमेतरा शहर के पुराने बाजार पारा क्षेत्र में स्थित यह मंदिर इस नगर की अपनी कुलदेवी को समर्पित है। इस स्थान की सबसे खास और सामाजिक समरसता से भरी विशेषता यह है कि मंदिर के ठीक सामने एक मस्जिद भी स्थित है, जो सदियों से इस क्षेत्र में हिंदू-मुस्लिम भाईचारे और साम्प्रदायिक एकता का एक बहुत बड़ा और जीवंत प्रतीक मानी जाती है।

29. महिषासुर मर्दनी, चैतुरगढ़

कोरबा जिले के पाली कस्बे से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित ऐतिहासिक चैतुरगढ़ का किला अपनी प्राकृतिक सुंदरता और महिषासुर मर्दनी माता के प्राचीन मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह रमणीय स्थल धार्मिक रूप से पूजनीय होने के साथ-साथ छत्तीसगढ़ के सबसे प्रमुख पर्यटन और ट्रैकिंग आकर्षणों में भी अपना विशेष स्थान रखता है।

30. माता कौशल्या मंदिर, चंदखुरी

राजधानी रायपुर से लगभग बाईस किलोमीटर दूर चंदखुरी गांव में एक विशाल झील के बीचों-बीच टापू पर स्थित यह मंदिर भगवान राम की माता कौशल्या को समर्पित है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि यहीं माता कौशल्या का जन्म हुआ था, और इसी ऐतिहासिक गौरव के कारण संपूर्ण छत्तीसगढ़ को भगवान श्रीराम का ननिहाल होने का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ है।

31. सर्वमंगला मंदिर, कोरबा

छत्तीसगढ़ की ऊर्जा राजधानी कोरबा में पावन हसदेव नदी के सुरम्य तट के किनारे स्थित यह मंदिर जगत जननी मां दुर्गा के स्वरूप को समर्पित है। यहां रोज सुबह-शाम होने वाली आरती में शामिल होने के लिए आसपास के इलाकों से सैकड़ों श्रद्धालु प्रतिदिन दर्शन के लिए पहुंचते हैं और नदी के घाट पर शांति का अनुभव करते हैं।

32. सिद्धपीठ मां महामाया मंदिर, कवर्धा

कवर्धा जिले के डोंगरिया कला गांव की शांत गोद में स्थित यह प्रसिद्ध मंदिर स्वयंभू शिव-शक्ति परिवार की दुर्लभ और प्राचीन प्रतिमा के लिए क्षेत्रभर में जाना जाता है। क्षेत्रीय नागरिकों और आसपास के ग्रामीण श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का यह मंदिर एक प्रमुख केंद्र है, जहाँ विशेषकर मेलों और पर्वों के समय भारी चहल-पहल रहती है।

33. बंजारी माता मंदिर, रायगढ़

रायगढ़ शहर से लगभग बीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह बंजारी माता मंदिर मुख्य रूप से बंजारा समाज की कुलदेवी के रूप में समर्पित है। इस मंदिर परिसर के पास बना हुआ सुंदर तालाब और हरा-भरा बगीचा इसे एक बेहतरीन पर्यटन स्थल के रूप में भी आकर्षक बनाते हैं, जहाँ लोग परिवार के साथ पिकनिक मनाने भी आते हैं।

34. अंबेटिकरा मंदिर, धरमजयगढ़

धरमजयगढ़ से लगभग सात किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह रमणीय मंदिर मां दुर्गा की आराधना के लिए प्रसिद्ध है। इस पावन स्थल के पास ही भगवान गणेश और हनुमान जी की करीब तीस फीट ऊंची विशाल प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। मंदिर से जुड़ी स्थानीय जनश्रुति बताती है कि प्रभु श्रीराम अपने वनवास के काल में इस क्षेत्र में कुछ समय तक रुके थे।

35. बुढ़ी माई मंदिर, रायगढ़

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में तराईमाल मुख्य मार्ग पर स्थित बूढ़ी माई का यह मंदिर और इसके पास का मां बंजारी का स्थान एक बहुत ही प्रसिद्ध देवी स्थल है। यहां साल के बारह महीने श्रद्धालुओं का आना-जाना निरंतर लगा रहता है, लेकिन नवरात्रि के इन पवित्र दिनों के दौरान यहां दर्शन करने वालों की बहुत बड़ी संख्या पहुंचती है।

36. हिंगलाज माता सिद्धपीठ, कवर्धा

कवर्धा जिले के सुतियापाट पहाड़ पर करीब पंद्रह सौ फीट से अधिक ऊंचाई पर स्थित हिंगलाज माता का यह पवित्र मंदिर देश के बावन सिद्ध पीठों में प्रमुखता से गिना जाता है। भक्तजन अपनी भारी श्रद्धा और संकल्प के साथ इन पथरीले और दुर्गम रास्तों से पैदल चढ़ाई करके माता के दरबार में पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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