
Kankali Math Raipur History: दुनियाभर में अनगिनत मंदिर और धार्मिक स्थल मौजूद हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के पुरानी बस्ती इलाके में स्थित कंकाली मठ अपने आप में बेहद अनोखा और रहस्यमयी है। यह प्रदेश का इकलौता ऐसा ऐतिहासिक मंदिर है जिसके कपाट साल भर में केवल एक ही दिन यानी विजयादशमी के पावन अवसर पर खोले जाते हैं। साल के बाकी तीन सौ चौसठ दिन यह मठ पूरी तरह बंद रहता है और दशहरे के दिन ही यहां भक्तों की भारी भीड़ जुटती है।

रायपुर की पुरानी बस्ती में स्थित कंकाली मठ का है प्राचीन इतिहास
Raipur Kankali Temple Dussehra Secret: राजधानी रायपुर के पुराने हिस्से यानी पुरानी बस्ती में स्थित कंकाली मठ का इतिहास सदियों पुराना है। स्थानीय मान्यताओं और पुजारियों के अनुसार इस स्थान पर तेरहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक केवल नागा साधु ही मां कंकाली की पूजा-अर्चना करते थे। ऐसा माना जाता है कि नागा संन्यासियों ने इस मठ की स्थापना मुख्य रूप से अपनी तंत्र साधना को पूरा करने के लिए की थी, जिसके कारण आज भी इस स्थान से कई रहस्य जुड़े हुए हैं।

मंदिर में रखे गए हैं नागा साधुओं के हजारों साल पुराने अस्त्र-शस्त्र
Naga Sadhus History Kankali Math Raipur: कंकाली मठ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां सत्रहवीं शताब्दी में बने भव्य मंदिर के भीतर देवी मां के साथ-साथ नागा साधुओं के उपयोग किए गए हजारों साल पुराने हथियार भी सुरक्षित रखे गए हैं। इन प्राचीन शस्त्रों में तलवार, फरसा, भाला, ढाल, चाकू और तीर-कमान शामिल हैं। विजयादशमी के दिन इन्हीं ऐतिहासिक शस्त्रों की विधिवत पूजा की जाती है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग इस मठ में पहुंचते हैं।

माता के संन्यासियों से नाराज होने और नए स्थान पर विराजमान होने की कथा
मंदिर के पुजारी सच्चिदानंद पाठक के अनुसार प्राचीन काल में माता कंकाली इसी मठ में निवास करती थीं और संन्यासी उनकी सेवा करते थे। एक बार किसी बात पर माता संन्यासियों से नाराज होकर वहां से चली गईं। जब संन्यासी उनके पीछे गए और वापस लौटने की प्रार्थना की, तो माता ने मना कर दिया और उसी जगह नया मंदिर बनवाने को कहा। संन्यासियों द्वारा असमर्थता जताने पर माता ने उन्हें एक विशेष तालाब खुदवाने का निर्देश दिया।
तालाब की खुदाई में निकली कौड़ियों से कराया गया था भव्य मंदिर का निर्माण
माता के कहे अनुसार जब संन्यासियों ने उस स्थान पर तालाब की खुदाई की, तो वहां से बड़ी संख्या में सुंदर कौड़ियां प्राप्त हुईं। लगभग सात सौ साल पहले इन कौड़ियों का उपयोग धन या मुद्रा के रूप में किया जाता था। संन्यासियों ने उन्हीं कौड़ियों की मदद से आर्थिक प्रबंध किया और फिर वहां भव्य मंदिर का निर्माण करवाकर माता जगदंबा की प्रतिमा की स्थापना की। इसके बाद यह स्थान कंकाली मठ के रूप में प्रसिद्ध हो गया।

केवल विजयादशमी के दिन पूरे तेज और अस्त्र-शस्त्र के साथ आती हैं माता
पुजारियों की मान्यताओं के अनुसार जब संन्यासियों ने माता से पुराने मठ को सूना न छोड़ने का अनुरोध किया, तब माता ने वचन दिया था कि वे हर साल केवल दशहरे के दिन अपने पूरे तेज और अस्त्र-शस्त्रों के साथ पुराने मठ में वापस आएंगी। परंपरा के अनुसार शारदीय नवरात्रि की नवमी तिथि की देर रात माता कंकाली इस प्राचीन मठ में विश्राम करने पहुंचती हैं और विजयादशमी के दिन उनके दर्शन के लिए कपाट खोले जाते हैं।

दशहरे के दिन इस पावन दरबार में आने वाले हर भक्त की पूरी होती है मुराद
ऐसी गहरी लोक आस्था है कि विजयादशमी के दिन जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से कंकाली मठ पहुंचकर माता के दर्शन करता है और शस्त्र पूजन में शामिल होता है, उसकी हर मनोकामना अवश्य पूरी होती है। साल में केवल कुछ घंटों के लिए खुलने वाले इस रहस्यमयी और चमत्कारिक मंदिर के द्वार खुलने का इंतजार स्थानीय लोग पूरे साल बड़ी बेसब्री के साथ करते हैं।



