
रायपुर: छत्तीसगढ़ विधानसभा के शीतकालीन सत्र के चौथे दिन सदन की कार्यवाही शुरू होते ही भारी हंगामा देखने को मिला। कांग्रेस के सभी विधायक हाथों में ‘सत्यमेव जयते’ की तख्तियां और पोस्टर लेकर नारेबाजी करते हुए सदन के भीतर पहुंचे। विपक्ष के इस तेवर को देखकर सत्ता पक्ष के विधायक अजय चंद्राकर भड़क गए। उन्होंने सदन की गरिमा का हवाला देते हुए विधानसभा अध्यक्ष से कहा कि छत्तीसगढ़ विधानसभा में पोस्टर लहराने की कोई परंपरा नहीं रही है। चंद्राकर ने सीधे पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से सवाल किया कि क्या उनके कार्यकाल के दौरान ऐसी कोई व्यवस्था सदन में मान्य थी? इस मुद्दे को लेकर पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई।
अजय चंद्राकर और नेता प्रतिपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक
विवाद तब और बढ़ गया जब नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत ने बोलना शुरू किया। अजय चंद्राकर ने उन्हें टोकते हुए कहा कि प्रश्नकाल के दौरान भाषण देने का कोई नियम नहीं है। उन्होंने महंत को उनकी पुरानी भूमिका याद दिलाते हुए पूछा कि जब वे खुद विधानसभा अध्यक्ष थे, तब क्या उन्होंने कभी पोस्टर लाने की अनुमति दी थी? इस पर कांग्रेस विधायक दल ने एकजुट होकर पलटवार किया और कहा कि नेता प्रतिपक्ष को बोलने से कोई नहीं रोक सकता। सदन के भीतर ‘सत्यमेव जयते’ के नारों और तीखी बहसों के चलते माहौल इतना गरमा गया कि सामान्य कामकाज करना मुश्किल हो गया।
विधानसभा अध्यक्ष की नसीहत रही बेअसर
विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने बीच-बचाव करते हुए सभी सदस्यों से शांति बनाए रखने का अनुरोध किया। उन्होंने विधायकों को संसदीय परंपराओं की याद दिलाई और कहा कि बैनर-पोस्टर लेकर सदन की कार्यवाही में शामिल होना नियमों के खिलाफ है। अध्यक्ष ने कांग्रेस विधायकों से आग्रह किया कि वे पोस्टर सदन के बाहर रखकर आएं और कार्यवाही को शांतिपूर्ण तरीके से चलाने में सहयोग करें। हालांकि, अध्यक्ष की इस समझाइश का विपक्षी सदस्यों पर कोई खास असर नहीं हुआ और वे लगातार नारेबाजी करते रहे, जिससे प्रश्नकाल की कार्यवाही पूरी तरह प्रभावित हुई।
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हंगामे के चलते कार्यवाही रोकनी पड़ी
दोनों पक्षों की ओर से जारी लगातार नारेबाजी और व्यक्तिगत आरोपों के कारण सदन की स्थिति नियंत्रण से बाहर होने लगी। जब विपक्षी विधायक सदन के गर्भगृह की ओर बढ़ने लगे और हंगामा शांत नहीं हुआ, तो विधानसभा अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही को कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया। सदन के बाहर भी इस ‘पोस्टर पॉलिटिक्स’ को लेकर चर्चाएं तेज रहीं, जहाँ भाजपा ने इसे संसदीय परंपराओं का अपमान बताया, वहीं कांग्रेस ने इसे अपनी आवाज बुलंद करने का एक तरीका करार दिया। इस विवाद के कारण महत्वपूर्ण विधायी कार्यों और जनहित के सवालों पर चर्चा नहीं हो सकी।



