छत्तीसगढ़ में खतरनाक वायरस की दस्तक: जंगली सूअरों में फैला अफ्रीकन स्वाइन फीवर, प्रशासन ने जारी किया अलर्ट

छत्तीसगढ़ के जंगलों में एक बेहद खतरनाक वायरस ने प्रवेश कर लिया है, जिससे वन विभाग और पशुपालन विभाग की चिंताएं बढ़ गई हैं। महासमुंद और बलौदा बाजार जिले के जंगलों में पिछले कुछ दिनों से जंगली सूअरों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो रही थी। मौतों की असल वजह जानने के लिए जब सैंपल भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (ICAR-IVRI) बरेली भेजे गए, तो वहां से आई रिपोर्ट ने सबको चौंका दिया। जांच में पुष्टि हुई है कि इन सूअरों की जान ‘अफ्रीकन स्वाइन फीवर’ (ASF) की वजह से हुई है। रिपोर्ट मिलते ही डीएफओ ने प्रभावित इलाकों में कड़े सुरक्षात्मक निर्देश जारी कर दिए हैं।

100% मृत्यु दर वाला जानलेवा संक्रमण

अफ्रीकन स्वाइन फीवर (ASF) को सूअरों के लिए सबसे घातक बीमारियों में से एक माना जाता है। यह एक ऐसा वायरस है जो न केवल तेजी से फैलता है, बल्कि इसमें संक्रमित जानवर की जान बचने की संभावना लगभग शून्य होती है। यह वायरस संक्रमित जंगली या घरेलू सूअरों के सीधे संपर्क, उनके लार, खून या मल-मूत्र के जरिए एक से दूसरे जानवर में पहुंचता है। चूंकि इसकी मृत्यु दर 100 प्रतिशत तक हो सकती है, इसलिए वन विभाग इसे लेकर बेहद गंभीर है ताकि यह संक्रमण पालतू सूअरों तक न पहुंच जाए।

कैसे फैलता है यह घातक वायरस?

विशेषज्ञों के मुताबिक, यह वायरस कई तरीकों से अपना दायरा बढ़ाता है। पहला रास्ता संक्रमित और स्वस्थ सूअरों का आपस में मिलना है। इसके अलावा, दूषित मांस, संक्रमित व्यक्ति के कपड़े, जूते और यहां तक कि वाहनों के जरिए भी यह एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंच सकता है। जंगलों में पाए जाने वाले ‘टिक्स’ (किल्नी) भी इस वायरस को फैलाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसकी मारक क्षमता इतनी अधिक है कि एक बार इलाके में प्रवेश करने के बाद इसे रोकना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

बीमारी के लक्षण: पहचानना है जरूरी

यदि किसी सूअर को अफ्रीकन स्वाइन फीवर होता है, तो उसके शरीर में कुछ खास बदलाव नजर आने लगते हैं। सबसे पहले जानवर को बहुत तेज बुखार आता है और वह खाना-पीना पूरी तरह छोड़ देता है। संक्रमण बढ़ने पर शरीर की त्वचा पर लाल और नीले रंग के धब्बे उभरने लगते हैं। इसके साथ ही जानवर को उल्टियां होने लगती हैं और खून के साथ दस्त की शिकायत भी देखी जाती है। इन लक्षणों के दिखते ही तत्काल पशु चिकित्सा विभाग को सूचित करना अनिवार्य है ताकि संक्रमण को फैलने से रोका जा सके।

इंसानों को खतरा नहीं, पर सावधानी जरूरी

आम लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह वायरस सूअरों से इंसानों में भी फैल सकता है? डॉक्टरों ने स्पष्ट किया है कि अफ्रीकन स्वाइन फीवर इंसानों के लिए सीधा खतरा नहीं है, यानी यह ‘जूनोटिक’ बीमारी नहीं है। हालांकि, इंसान इस वायरस के ‘करियर’ (वाहक) बन सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति संक्रमित क्षेत्र में जाता है, तो उसके जूतों या कपड़ों के साथ यह वायरस दूसरे स्वस्थ सूअरों तक पहुंच सकता है। इसलिए इंसानों को भी प्रभावित क्षेत्रों में जाने से बचने और साफ-सफाई का ध्यान रखने की सलाह दी गई है।

बचाव ही इलाज: वन विभाग की सख्त एडवाइजरी

अफ्रीकन स्वाइन फीवर की सबसे डरावनी बात यह है कि अभी तक दुनिया में इसका कोई प्रभावी टीका (वैक्सीन) या दवा उपलब्ध नहीं है। ऐसे में केवल बचाव ही एकमात्र रास्ता बचता है। वन विभाग और पशुपालन विभाग ने सूअर पालकों को निर्देश दिया है कि वे अपने फार्म को पूरी तरह कीटाणुरहित रखें। सूअरों को बाहर का खुला खाना या जूठन खिलाने से पूरी तरह बचें। यदि किसी जंगली सूअर का शव दिखे, तो उसे हाथ न लगाएं और तुरंत प्रशासन को खबर करें। संक्रमण वाले जिलों में निगरानी दल तैनात कर दिए गए हैं ताकि स्थिति को नियंत्रित रखा जा सके।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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