
छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में अफीम की अवैध खेती के मामले ने अब प्रशासनिक अमले में हड़कंप मचा दिया है। जिले के समोदा गांव में जिस खेत में नशे की फसल लहलहा रही थी, उसे सरकारी दस्तावेजों में ‘मक्का’ और ‘अन्य अनाज’ बताकर रिपोर्ट किया जा रहा था। इस गंभीर लापरवाही और फर्जीवाड़े को देखते हुए कलेक्टर अभिजीत सिंह ने सख्त कदम उठाया है। कलेक्टर ने कृषि विस्तार अधिकारी (RAEO) एकता साहू को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया है। प्रशासन की इस कार्रवाई से उन अधिकारियों में खौफ है जो कागजों पर फर्जी रिपोर्टिंग कर शासन को गुमराह कर रहे थे।
मक्के की आड़ में अफीम का खेल
मामले का खुलासा तब हुआ जब पुलिस ने समोदा में अफीम की खेती पकड़ी, जबकि कृषि विभाग के रिकॉर्ड में इसे मक्के की फसल के रूप में दर्ज किया गया था। जांच में सामने आया कि संबंधित विभाग के अधिकारी मौके पर जाने के बजाय दफ्तर में बैठकर ही रिपोर्ट तैयार कर रहे थे। कलेक्टर ने इससे पहले एकता साहू, फसल सर्वेयर शशिकांत साहू और पटवारी अनिता साहू को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। संतोषजनक जवाब न मिलने और प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने पर कृषि विस्तार अधिकारी पर गाज गिरी है।
गिरदावरी रिपोर्ट पर छिड़ा सियासी घमासान
अफीम की इस खेती ने अब राजनीतिक रंग भी ले लिया है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर बलरामपुर और दुर्ग के गिरदावरी दस्तावेज साझा करते हुए सरकार पर तीखा हमला बोला है। बघेल ने तंज कसते हुए लिखा कि “भाजपा की साय सरकार में अफीम अब ‘अन्य अनाज’ बन गया है।” उन्होंने सवाल उठाया कि जब मौके पर अफीम की खेती हो रही थी, तो वर्ष 2025-26 की रिपोर्ट में खसरा नंबर 0.2410 हेक्टेयर के सामने ‘अन्य अनाज’ की एंट्री कैसे हुई?
सरकारी प्रोत्साहन राशि का बंदरबांट
जांच में एक और बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर हुआ है। विनायक ताम्रकार और विमल ताम्रकार के जिस खेत को ‘मक्का प्रदर्शन प्लॉट’ बताकर रिपोर्ट किया गया था, वहां वास्तव में धान लगा हुआ था। अधिकारियों ने शासन को गुमराह करने के लिए जानबूझकर लोकेशन बदली और मक्के के नाम पर मिलने वाली सरकारी प्रोत्साहन राशि भी जारी करवा ली। यह सीधे तौर पर सरकारी धन का दुरुपयोग और पद का गलत इस्तेमाल है।
फोटो में भी की गई बड़ी जालसाजी
नियम के मुताबिक, किसी भी प्रदर्शन प्लॉट की फोटो उसी किसान के साथ अपलोड करनी होती है जिसे सरकारी लाभ मिलना है। लेकिन इस मामले में रिपोर्ट तैयार करने के लिए धान के खेत के बजाय किसी दूसरे खेत के पास एक अनजान किसान को खड़ा कर फोटो खींची गई। चौंकाने वाली बात यह है कि जिस मक्के के खेत की फोटो रिपोर्ट में लगाई गई, ठीक उसके पीछे ही अफीम की खेती छिपी हुई थी।
डिजिटल सर्वे की पोल खुली
फसलों की सटीक जानकारी के लिए सरकार ने डिजिटल सर्वे की व्यवस्था की है, लेकिन यहां वह भी फेल साबित हुई। सर्वेयर शशिकांत साहू ने सितंबर 2025 में डिजिटल सर्वे के दौरान खसरा नंबर 309 को खाली (पड़ती) भूमि और खसरा नंबर 310 में धान की फसल दिखाई थी। जबकि हकीकत में इन्हीं दोनों नंबरों पर अफीम की अवैध फसल उगाई जा रही थी। यह दर्शाता है कि डिजिटल सिस्टम होने के बावजूद मैदानी कर्मचारी किस तरह फर्जी आंकड़े फीड कर रहे हैं।
कलेक्टर की दोटूक: दोषियों को नहीं बख्शेंगे
कलेक्टर अभिजीत सिंह ने साफ कर दिया है कि शासन की योजनाओं में फर्जीवाड़ा और अवैध गतिविधियों को संरक्षण देने वाले किसी भी कर्मचारी को बख्शा नहीं जाएगा। सस्पेंशन के बाद अब इस मामले में विभागीय जांच (DE) भी शुरू कर दी गई है। यह भी पता लगाया जा रहा है कि क्या इस रैकेट में और भी बड़े चेहरे शामिल हैं। फिलहाल, बलरामपुर से लेकर दुर्ग तक अफीम की खेती के इन मामलों ने पूरे प्रदेश की गिरदावरी व्यवस्था पर सवालिया निशान लगा दिया है।
नशे की खेती और प्रशासनिक नाकामी
अफीम की खेती जैसी गंभीर गतिविधि का कृषि और राजस्व विभाग की नजरों से बचा रहना एक बड़ी प्रशासनिक नाकामी मानी जा रही है। अफीम एक प्रतिबंधित फसल है जिसकी खेती के लिए नारकोटिक्स विभाग से विशेष अनुमति लेनी होती है। छत्तीसगढ़ में इस तरह अवैध रूप से अफीम उगाना और उसे ‘अनाज’ बताकर छिपाना एक बड़े आपराधिक साजिश की ओर इशारा करता है। पुलिस अब उन कड़ियों को जोड़ रही है जो इस नशे के काले कारोबार के पीछे हैं।



