
CG Legislative Assembly Budget Session: छत्तीसगढ़ बजट सत्र के दौरान उस वक्त सन्नाटा खिंच गया जब भाजपा के वरिष्ठ विधायक अजय चंद्राकर ने प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था पर अपनी ही सरकार को आईना दिखाया। उन्होंने राज्य में कुकुरमुत्ते की तरह खुल रहे निजी विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए। चंद्राकर ने तंज कसते हुए कहा कि कई कॉलेजों में न तो पर्याप्त प्रोफेसर हैं और न ही संसाधन, फिर भी छात्रों से मोटी फीस वसूली जा रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब उच्च शिक्षा विभाग के पास इन संस्थानों के निरीक्षण के लिए पर्याप्त कर्मचारी ही नहीं हैं, तो इन्हें मान्यता कैसे दी जा रही है? साथ ही, बाहरी राज्यों से कुलपतियों की नियुक्ति पर उन्होंने पूछा कि क्या छत्तीसगढ़ में योग्य शिक्षाविदों का अकाल पड़ गया है?
अफसरों की ‘नदारद’ बहादुरी: मंत्रियों को तवज्जो नहीं दे रहे अधिकारी?
सदन में हंगामा तब और बढ़ गया जब राजस्व विभाग की अनुदान मांगों पर चर्चा शुरू हुई, लेकिन विभाग के सचिव समेत कई आला अफसर दीर्घा से नदारद मिले। विपक्ष ने इसे सदन की अवमानना बताते हुए हंगामा शुरू कर दिया। पूर्व मंत्री उमेश पटेल ने चुटकी लेते हुए कहा कि मौजूदा सरकार में अधिकारियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे मंत्रियों को गंभीरता से लेना ही छोड़ चुके हैं। मंत्री टंकराम वर्मा के सफाई देने के बावजूद विपक्ष शांत नहीं हुआ और अधिकारियों की कार्यप्रणाली के विरोध में चर्चा का बहिष्कार कर सदन से बाहर चला गया।
बीज वितरण में ‘खेल’: अलसी बीज खरीदी पर भ्रष्टाचार के आरोप
भ्रष्टाचार का मुद्दा केवल राजस्व तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कृषि विभाग की अनुदान मांगों के दौरान भी गूंजा। कांग्रेस विधायक उमेश पटेल ने रायगढ़ जिले में अलसी बीज वितरण में बड़े घोटाले का आरोप लगाया। उन्होंने दावा किया कि बीज निगम ने नियमों को ताक पर रखकर अपने पसंदीदा ठेकेदारों को लाभ पहुंचाया और गुणवत्ताहीन बीजों की सप्लाई की। इस पर कृषि मंत्री रामविचार नेताम ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सदन को आश्वस्त किया कि पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच कराई जाएगी और दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई होगी।
विपक्ष का कड़ा रुख: मुद्दों की गूंज और सदन का बहिष्कार
बजट सत्र का यह दिन पूरी तरह से हंगामे की भेंट चढ़ गया। निजी विश्वविद्यालयों में बदहाली, भ्रष्टाचार के आरोप और प्रशासनिक लापरवाही जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सरकार घिरती नजर आई। विपक्ष ने एक सुर में कहा कि जब तक जनता के प्रति जवाबदेही और अधिकारियों की सदन के प्रति जिम्मेदारी तय नहीं होती, तब तक सार्थक चर्चा संभव नहीं है। विधानसभा में मचे इस घमासान ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले दिनों में शिक्षा और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर सरकार की राह आसान नहीं होने वाली है।



