
रायपुर: छत्तीसगढ़ के बालोद में आयोजित हुए स्काउट्स एंड गाइड्स जंबूरी महोत्सव को लेकर सियासी पारा चढ़ गया है। पूर्व संसदीय सचिव उपाध्याय ने राष्ट्रीय जंबूरी के इस पूरे आयोजन में करोड़ों रुपये के घोटाले की आशंका जताते हुए इसकी सीबीआई (CBI) जांच की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया कि बिना किसी पारदर्शी निविदा प्रक्रिया के भारी-भरकम राशि पानी की तरह बहा दी गई। उपाध्याय ने शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल दागते हुए पूछा है कि क्या अधिकारियों ने मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन किया था? अगर सत्यापन हुआ, तो इतनी बड़ी गड़बड़ियां कैसे छूट गईं? और यदि बिना जांच के ही भुगतान कर दिया गया, तो यह सीधे तौर पर सरकारी खजाने की खुली लूट है।
अस्थायी निर्माण या भ्रष्टाचार का उत्सव
पूर्व विधायक ने आयोजन के खर्चों पर कटाक्ष करते हुए कहा कि 5 करोड़ रुपये के कुल बजट में से अकेले 2 करोड़ रुपये केवल अस्थायी शौचालयों के निर्माण पर फूंक दिए गए। उन्होंने हैरानी जताते हुए पूछा कि क्या यह स्काउट-गाइड की जंबूरी थी या अस्थायी निर्माण के नाम पर फिजूलखर्ची का कोई उत्सव? उनका कहना है कि शिक्षा विभाग खुद बच्चों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाता है, लेकिन उसी विभाग की निगरानी में करोड़ों के संदिग्ध भुगतान को हरी झंडी दे दी गई। इस मामले में उन वरिष्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए जिन्होंने बिना सोचे-समझे सरकारी फाइलों पर हस्ताक्षर किए हैं।
टेंट और आवास के बिलों में भारी खेल
उपाध्याय ने बिलों के कुछ चौंकाने वाले आंकड़े भी साझा किए हैं। उनके अनुसार, 1200 लोगों के रहने के लिए बनाए गए स्विस टेंट का बिल ही 64 लाख रुपये थमा दिया गया है। इसी तरह, 15 हजार बच्चों के रुकने के लिए बनाए गए 2000 टेंटों का भुगतान 76 लाख रुपये करने का आदेश जारी हुआ है। आइटम नंबर 28 का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि टेंट और आवास की व्यवस्था के नाम पर जिस तरह से लाखों रुपये के बिल तैयार किए गए हैं, वह पूरी प्रक्रिया को संदेह के घेरे में खड़ा करता है।
सत्यापन से पहले ही साक्ष्य मिटने का डर
जेम (GeM) पोर्टल पर जारी निविदाओं का हवाला देते हुए उपाध्याय ने बताया कि 5 जनवरी 2026 को दिए गए आदेश के तहत ‘अमर भारत किराया भंडार’ ने 400 टॉयलेट और 2000 टेंट का काम पूरा कर दिया है। लेकिन सबसे बड़ी चिंता यह है कि कार्यक्रम खत्म होने के महज दो दिन बाद आयोजन स्थल से सारा अस्थायी ढांचा हटा दिया जाएगा। ऐसे में यह साबित करने के लिए कोई भौतिक साक्ष्य नहीं बचेगा कि असल में कितने टेंट लगाए गए थे और कितने टॉयलेट्स का निर्माण हुआ था। विपक्षी नेताओं का दावा है कि सबूत मिटाने की इसी जल्दबाजी के बीच फर्जी बिलों का भुगतान लेने की तैयारी है।
प्रशासनिक चुप्पी और बढ़ती राजनीतिक रार
इस पूरे विवाद पर शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों ने फिलहाल मौन साध रखा है, जिससे विपक्ष के आरोपों को और बल मिल रहा है। उपाध्याय ने चेतावनी दी है कि यदि इस मामले की उच्च स्तरीय जांच नहीं कराई गई, तो यह न केवल वित्तीय अनियमितता होगी बल्कि उन हजारों बच्चों के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ होगा जिनके नाम पर यह बजट आवंटित किया गया था। अब सबकी नजरें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं कि क्या इन गंभीर आरोपों पर कोई ठोस कार्रवाई होती है या फिर मामला फाइलों में ही दबकर रह जाता है।



