
छत्तीसगढ़ के निजी स्कूल संचालकों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत मिलने वाली प्रतिपूर्ति राशि में लंबे समय से बढ़ोतरी नहीं होने के कारण स्कूलों में भारी आक्रोश है। रविवार को हुई ‘छत्तीसगढ़ प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन’ की प्रदेश स्तरीय बैठक में सर्वसम्मति से ‘असहयोग आंदोलन’ शुरू करने का फैसला लिया गया। स्कूल संचालकों का कहना है कि वे अब शिक्षा विभाग के किसी भी आदेश या नोटिस का पालन नहीं करेंगे जब तक कि उनकी मांगें पूरी नहीं हो जातीं।
सरकारी कामकाज का बहिष्कार और तालाबंदी की चेतावनी
एसोसिएशन ने स्पष्ट किया है कि इस असहयोग आंदोलन के दौरान प्रदेश के निजी स्कूल शिक्षा विभाग के किसी भी पत्र या निर्देश का जवाब नहीं देंगे। स्कूलों का कहना है कि वे सालों से घाटा सहकर गरीब बच्चों को पढ़ा रहे हैं, लेकिन सरकार लागत के अनुसार भुगतान नहीं कर रही है। अब स्थिति ऐसी बन गई है कि बिना आर्थिक मदद के स्कूलों का संचालन करना मुश्किल हो गया है। संचालकों ने चेतावनी दी है कि यदि विभाग ने जल्द ही सकारात्मक कदम नहीं उठाया, तो यह आंदोलन और भी उग्र रूप ले सकता है।
13 साल से नहीं बढ़ी राशि, हाईकोर्ट के आदेश की भी अनदेखी
निजी स्कूलों के पदाधिकारियों का आरोप है कि पिछले 13 वर्षों से आरटीई के तहत दी जाने वाली राशि में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इस मामले को लेकर बिलासपुर हाईकोर्ट में याचिका भी दायर की गई थी। कोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में सरकार को 6 महीने के भीतर मांगों पर निर्णय लेने का निर्देश दिया था, लेकिन इस समय सीमा के बीत जाने के बाद भी विभाग की ओर से कोई ठोस पहल नहीं हुई। एसोसिएशन का कहना है कि विभाग की यह संवेदनहीनता कोर्ट की अवमानना के समान है।
खर्च के हिसाब से मांगी प्रतिपूर्ति, पुरानी बकाया राशि पर जोर
संगठन ने सरकार के सामने अपनी मांगों का नया चार्ट रखा है। उनकी मांग है कि प्राथमिक कक्षाओं के लिए मिलने वाली 7000 रुपये की राशि को बढ़ाकर 18000 रुपये किया जाए। इसी तरह माध्यमिक शिक्षा के लिए 11,500 की जगह 22,000 और हाई स्कूल/हायर सेकेंडरी के लिए अधिकतम सीमा 15,000 से बढ़ाकर 25,000 रुपये प्रति छात्र/प्रति वर्ष की जाए। स्कूल संचालकों की यह भी मांग है कि बढ़ी हुई यह दर पिछले 3 वर्षों के बकाया भुगतान के साथ लागू की जाए ताकि स्कूलों की आर्थिक स्थिति सुधर सके।
गरीब बच्चों की शिक्षा पर संकट के बादल
निजी स्कूलों के इस कड़े रुख से आरटीई के तहत पढ़ रहे हजारों गरीब बच्चों की शिक्षा पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। संचालकों का कहना है कि महंगाई के इस दौर में पुराने रेट पर शिक्षा देना असंभव है। शिक्षकों के वेतन, बिजली और भवन रखरखाव का खर्च कई गुना बढ़ गया है लेकिन सरकारी मदद वहीं की वहीं रुकी है। अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह बातचीत के जरिए इस गतिरोध को खत्म करती है या निजी स्कूलों का यह असहयोग आंदोलन राज्य की शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित करेगा।



