
बिलासपुर, जून 2025: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक ऐसा मुकदमा सुना, जिसने न्याय की दिशा में एक नया पैमाना तय किया है। चीफ जस्टिस रमेश कुमार सिन्हा की बेंच ने रायगढ़ फास्ट‑ट्रैक कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी युवक को दुष्कर्म का दोषी ठहराया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि महिला ने वर्षों तक आरोपी को पति के रूप में पहचान दी और शारीरिक सम्बन्ध भी उसी विश्वास में बनाए, तो इसे दुष्कर्म नहीं माना जा सकता।
विवाद कैसे शुरू हुआ?
साल 2008 में बिलासपुर की एक महिला, जो एक NGO में कार्यरत थी, ने आरोपी युवक से मिली। आरोपी ने खुद को शराबी पति से बेहतर जीवन का वादा किया और शादी का झांसा देकर किराए के मकान में साथ रहने को कहा। इसे विश्वास के आधार पर महिला ने उससे शारीरिक सम्बन्ध रखे, चलते-फिरते तीन बच्चे भी हुए।
फिर साल 2019 में आरोपी अचानक रायपुर चला गया और लौटकर नहीं आया। शिकायतकर्ता ने बाद में भावनात्मक शोषण मानते हुए रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने आरोपी पर धारा 376 (दुष्कर्म) के तहत केस दर्ज कर कोर्ट में चालान पेश किया।
फास्ट‑ट्रैक कोर्ट का फैसला
फास्ट‑ट्रैक कोर्ट ने शुरुआती जांच में आरोपी को दोषी करार दे दिया और दुष्कर्म के तहत सजामृत्यु—फांसी या उम्रकैद—का आदेश दिया।
क्या था हाईकोर्ट का तर्क?
आरोपी युवक ने हाईकोर्ट में जिरह की कि दोनों ने पति‑पत्नी की तरह रहकर परिवार की तरह जीवन बिताया। महिला ने सरकारी दस्तावेजों—आधार, वोटर आईडी, गैस कनेक्शन फॉर्म, बैंक स्टेटमेंट, राशन कार्ड—में आरोपी को पति बताया और सखी वन‑स्टॉप सेंटर में भी उसे पति कहा।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्वनिर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी परिस्थितियों में यह मान लेना मुश्किल है कि महिला “धोखे में थी”। यदि उसने आरोपी को पति की तरह स्वीकार किया, तो संबंध स्वेच्छा पर आधारित होता है, और यह दुष्कर्म नहीं हो सकता।
क्या हुआ फैसला?
हाईकोर्ट ने 3 जुलाई 2021 के फास्ट‑ट्रैक कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया और कहा कि आरोपियों को बरी किया जाए और नया आदेश जारी किया जाए।



