
छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के स्वैच्छिक अनुदान वितरण में बड़ी धांधली का मामला गरमा गया है। ‘दक्षिण कोसल’ की एक पड़ताल में सामने आया है कि शिक्षा और इलाज के नाम पर बांटी गई 25-25 हजार रुपये की सहायता राशि असल में उन लोगों तक पहुंची है, जो पहले से ही आर्थिक रूप से सक्षम हैं। हैरानी की बात यह है कि कई हितग्राहियों को तो यह तक नहीं पता कि उनके नाम से सरकारी खजाने से पैसा निकाला गया है। इस खुलासे के बाद जिला प्रशासन से लेकर मंत्रालय तक हड़कंप मच गया है, क्योंकि जनता के टैक्स का पैसा रसूखदारों की जेब भरने में इस्तेमाल हो रहा है।
निजी सचिव के भाई और रिश्तेदारों को मिली मलाई
भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा उदाहरण मंत्री के निजी सचिव (PA) धर्मजीत राजवाड़े से जुड़ा है। रिकॉर्ड के अनुसार, राजवाड़े के सगे भाई को शिक्षा के नाम पर 25 हजार रुपये का अनुदान दिया गया, जबकि वह किसी भी नियमित शैक्षणिक पाठ्यक्रम में पढ़ाई नहीं कर रहा है। इतना ही नहीं, चिरमिरी हल्दीबाड़ी के एक ही परिवार के पांच सदस्यों को बीमार बताकर 25-25 हजार रुपये जारी कर दिए गए। पड़ोसियों का कहना है कि यह पूरा परिवार पूरी तरह स्वस्थ है। बिना किसी पुख्ता दस्तावेज या मेडिकल सर्टिफिकेट के सरकारी धन का इस तरह आवंटन सीधे तौर पर सत्ता का दुरुपयोग है।
लाख रुपये तनख्वाह पाने वाले कर्मचारी भी बने ‘बेसहारा’
स्वैच्छिक अनुदान का उद्देश्य गरीब और लाचार लोगों की मदद करना होता है, लेकिन यहां गंगा उल्टी बह रही है। चिरमिरी डोमनहिल के एक एसईसीएल (SECCL) कर्मचारी को भी 25 हजार रुपये की सहायता दी गई, जिसका मासिक वेतन 1 लाख रुपये से ज्यादा है। जब सक्षम और संपन्न व्यक्तियों को सरकारी इमदाद दी जाती है, तो उन असली जरूरतमंदों का हक मारा जाता है जो अस्पताल और स्कूलों की फीस के लिए दफ्तरों के चक्कर काटते रहते हैं। इस संगठित खेल में मंत्री के करीबियों और सहयोगियों के रिश्तेदारों को रेवड़ियों की तरह पैसा बांटा गया है।
हितग्राहियों को खबर तक नहीं, किसने किया आवेदन?
जांच के दौरान जब कुछ लाभार्थियों से संपर्क किया गया, तो वे दंग रह गए। कई लोगों ने साफ कहा कि उन्होंने कभी अनुदान के लिए कोई फॉर्म नहीं भरा और न ही उन्हें पता है कि उनके नाम से आवेदन किसने लगाया। इससे यह आशंका गहरा गई है कि बिचौलियों या विभागीय कर्मचारियों ने फर्जी हस्ताक्षर और दस्तावेजों के जरिए यह पूरा घोटाला रचा है। अगर प्रशासन इन सभी ट्रांजैक्शन की गहराई से जांच करे, तो करोड़ों रुपये के गबन का खुलासा हो सकता है।
उपयोगिता प्रमाण पत्र की मांग और निष्पक्ष जांच की जरूरत
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे मामले की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन होना चाहिए। वकील राजकुमार मिश्रा के अनुसार, यदि सरकार सभी लाभार्थियों से ‘उपयोगिता प्रमाण पत्र’ (Utilization Certificate) मांग ले, तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। इससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि जिस काम के लिए पैसा लिया गया था, क्या वह वहां खर्च हुआ भी है या नहीं। राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर की गई जांच ही इस संगठित भ्रष्टाचार की परतों को खोल सकती है।
लोक निधि का दुरुपयोग है भ्रष्टाचार की श्रेणी: विशेषज्ञ
रिटायर्ड जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रदीप कुमार श्रीवास्तव का कहना है कि लोक निधि (Public Fund) को कोई भी जनप्रतिनिधि अपनी निजी संपत्ति समझकर मनमाने तरीके से खर्च नहीं कर सकता। सार्वजनिक धन का किसी विशेष व्यक्ति या अपने करीबियों को फायदा पहुंचाने के लिए इस्तेमाल करना सीधे तौर पर भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है। चूंकि मंत्री सरकार का हिस्सा हैं, इसलिए इस तरह की वित्तीय अनियमितता पाए जाने पर उनके और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त वैधानिक कार्रवाई का प्रावधान है।
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