
छत्तीसगढ़ के रायपुर स्थित इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (IGKV) में एक ऐसे वित्तीय खेल का पर्दाफाश हुआ है, जिसने शिक्षा जगत और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। नियमों में हेरफेर कर वैज्ञानिकों और अधिकारियों ने एक ऐसा फॉर्मूला तैयार किया, जिससे उनकी सेवानिवृत्ति के बाद की सुख-सुविधाओं का बोझ सीधे छात्रों की जेब पर डाल दिया गया। यह घोटाला केवल कुछ लाख का नहीं, बल्कि 2000 करोड़ रुपये से अधिक का होने का अनुमान है। इस पूरे प्रकरण में विश्वविद्यालय की स्थापना के समय से ही सरकारी खजाने और छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया गया है।
2000 करोड़ का पीएफ-पेंशन घोटाला: नियमों की धज्जियां उड़ीं
यह मामला इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना यानी 20 जनवरी 1987 से शुरू हुआ था। नियमों के अनुसार, विश्वविद्यालय में ‘कंट्रीब्यूटरी प्रोविडेंट फंड’ (CPF) लागू किया गया था। इस व्यवस्था के तहत जितना अंशदान विश्वविद्यालय देता, उतना ही हिस्सा कर्मचारी के वेतन से कटना अनिवार्य था। लेकिन पिछले तीन दशकों से यहाँ एक अनोखा ‘मौखिक समझौता’ चल रहा था, जिसमें कर्मचारियों के वेतन से एक रुपया भी नहीं कटा और उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद पूरी पेंशन और पीएफ का भुगतान किया जाता रहा।
CPF का वह फॉर्मूला, जिससे सरकारी खजाने को लगी चपत
सीपीएफ (CPF) के स्थापित नियमों के मुताबिक, कर्मचारी और विश्वविद्यालय दोनों को 13-13 प्रतिशत राशि फंड में जमा करनी थी। लेकिन विश्वविद्यालय के रसूखदार वैज्ञानिकों और अधिकारियों ने ऐसा चक्रव्यूह रचा कि कर्मचारियों की सैलरी से होने वाली कटौती को शून्य कर दिया गया। सारा वित्तीय बोझ विश्वविद्यालय के सामान्य फंड पर डाल दिया गया। इस तरह बिना कोई निवेश किए, यहाँ के स्टाफ ने करोड़ों रुपये की पेंशन डकार ली, जो सीधे तौर पर वित्तीय अनुशासन का उल्लंघन है।
पुराने कंपट्रोलर ने खोला राज: ऐसे पकड़ी गई गड़बड़ी
इस महाघोटाले का खुलासा विश्वविद्यालय में पदस्थ रहे कंपट्रोलर उमेश अग्रवाल ने किया। उन्होंने पाया कि कर्मचारियों को रिटायरमेंट के बाद दिए जाने वाले प्रोविडेंट फंड के लिए जो खाता बनाया गया है, उसमें विवि का हिस्सा तो जमा हो रहा है, लेकिन कर्मचारियों का 13 प्रतिशत अंशदान गायब है। इस खुलासे के बाद जब फाइलें खंगाली गईं, तो पता चला कि यह अनियमितता स्थापना के शुरुआती दिनों से ही जानबूझकर जारी रखी गई थी ताकि रसूखदारों को बिना किसी व्यक्तिगत खर्च के लाभ मिलता रहे।
छात्रों की फीस से वैज्ञानिकों की मौज: शिक्षा के मंदिर में लूट
हैरानी की बात यह है कि पेंशन के लिए जरूरी पैसों की भरपाई के लिए छात्रों की फीस का इस्तेमाल किया जा रहा है। वर्तमान में विश्वविद्यालय केवल 5 करोड़ रुपये इस फंड में जमा करता है, जबकि सालाना पेंशन का वितरण लगभग 46 करोड़ रुपये है। इस भारी अंतर को पाटने के लिए छात्रों से मिलने वाली एडमिशन फीस और अन्य शुल्कों को डायवर्ट किया जा रहा है। यानी छात्र अपनी पढ़ाई के लिए जो पैसा दे रहे हैं, उससे रिटायर वैज्ञानिकों की पेंशन का भुगतान हो रहा है।
सालाना आय 33 करोड़ और खर्च 46 करोड़: दिवालिया होने की कगार पर विवि
विश्वविद्यालय के वित्तीय आंकड़े बेहद डराने वाले हैं। CPF खाते में सालाना कुल 33 करोड़ रुपये जमा होते हैं, जिसमें 18 करोड़ छात्रों की फीस, 10 करोड़ एफडी का ब्याज और 5 करोड़ विवि का हिस्सा है। लेकिन खर्च 46 करोड़ रुपये है। अनुमान लगाया गया है कि साल 2030 तक यह फंड पूरी तरह से शून्य (Zero) हो जाएगा, जबकि तब तक सालाना पेंशन का बोझ बढ़कर 90 करोड़ रुपये तक पहुँच जाएगा। यह स्थिति विश्वविद्यालय को पूर्णतः वित्तीय दिवालियापन की ओर ले जा रही है।
जानबूझकर की गई अनदेखी: अविभाजित मध्य प्रदेश से जारी था खेल
‘द सूत्र’ की जांच में यह तथ्य सामने आया है कि इस गड़बड़ी की जानकारी शुरुआती दौर से ही उच्च अधिकारियों को थी। अविभाजित मध्य प्रदेश के समय भी इस पर पत्र-व्यवहार हुआ था। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद भी कृषि विभाग ने सवाल पूछे, लेकिन जवाब देने के बजाय मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। सबसे गंभीर बात यह है कि जिस भी अधिकारी ने इस अनियमितता पर सवाल उठाने की कोशिश की, उसका तत्काल तबादला (Transfer) कर दिया गया ताकि यह ‘पेंशन का खेल’ निर्बाध चलता रहे।
1 हजार लोगों का साझा खेल: जिम्मेदारी तय करना बड़ी चुनौती
विश्वविद्यालय की स्थापना के समय भर्ती हुए करीब 1 हजार वैज्ञानिक, टीचिंग और नॉन-टीचिंग स्टाफ इस व्यवस्था के लाभार्थी रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि इसके लिए लिखित स्वीकृति के बजाय मौखिक सहमति से सारा काम होता रहा। वर्तमान में इनमें से कई बड़े अधिकारी रिटायर हो चुके हैं और कुछ की मृत्यु भी हो चुकी है। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस 2000 करोड़ रुपये की रिकवरी किससे की जाएगी और इस संगठित भ्रष्टाचार के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा?
सालाना ऑडिट पर सवाल: आखिर कैसे बचते रहे दोषी?
यह भी एक बड़ा रहस्य है कि हर साल होने वाले सरकारी ऑडिट में यह इतनी बड़ी खामी कैसे नहीं पकड़ी गई? ऑडिटर्स ने हर साल विवि के खातों की जांच की, लेकिन 13 प्रतिशत की कटौती न होने के बावजूद पेंशन जारी होने पर आपत्ति क्यों नहीं उठाई? विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि ऑडिटिंग टीम और विवि प्रशासन की मिलीभगत का परिणाम हो सकता है। फिलहाल वित्त विभाग ने इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच के लिए एक विशेष टीम का गठन कर दिया है।



