
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पति-पत्नी विवाद के एक पेचीदा मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत अवैध संतान भी अपने पिता से भरण-पोषण पाने की हकदार है। कोर्ट ने कहा कि यह कानून बच्चों को बेसहारा और भिखारी बनने से बचाने के लिए बनाया गया है। मुख्य न्यायाधीश की सिंगल बेंच ने पति की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उसने बच्चे को अपना मानने से इनकार करते हुए पैसे देने का विरोध किया था।
शादी के महज पांच महीने बाद हुआ था जन्म
यह पूरा मामला बेमेतरा जिले के एक युवक से जुड़ा है जिसकी शादी 22 अप्रैल 2016 को हुई थी। गौना की रस्म के बाद पत्नी मई में ससुराल आई और इसके केवल पांच महीने बाद ही उसने एक बच्चे को जन्म दे दिया। पति ने आरोप लगाया कि शादी से पहले उनके बीच कोई शारीरिक संबंध नहीं थे इसलिए यह बच्चा उसका नहीं है। इसी आधार पर पति ने पत्नी से रिश्ता तोड़ लिया और उसे अपनाने से इनकार कर दिया।
तलाक मिला लेकिन बच्चे की जिम्मेदारी बरकरार
निचली अदालत ने पति के दावों को स्वीकार करते हुए तलाक की डिक्री तो जारी कर दी क्योंकि पत्नी शादी के समय ही गर्भवती थी। तलाक के बाद पति ने बच्चे को भी गुजारा भत्ता देने से मना कर दिया और कोर्ट में आवेदन लगाया। फैमिली कोर्ट ने पत्नी का भरण-पोषण तो बंद कर दिया लेकिन बच्चे के लिए 1,000 रुपये प्रति माह देने का आदेश बरकरार रखा जिसे बाद में पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
सामाजिक न्याय और कानून का उद्देश्य
हाईकोर्ट ने पति के इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया कि बच्चा उसका जैविक पुत्र नहीं है। अदालत ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 एक कल्याणकारी प्रावधान है जिसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं और बच्चों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है। भले ही बच्चा अवैध संबंधों की संतान हो लेकिन कानून की नजर में उसे संरक्षण मिलना अनिवार्य है। ऐसे फैसले समाज में कमजोर वर्ग के प्रति न्याय को और अधिक मजबूती प्रदान करते हैं।
मामले के प्रमुख कानूनी तथ्य और फैसला
इस मामले में कोर्ट ने साफ कर दिया कि बच्चे को संरक्षण देना कानून की प्राथमिक जिम्मेदारी है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब पति को हर महीने एक हजार रुपये की तय राशि बच्चे के पालन-पोषण के लिए देनी होगी। कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 और 127 का उद्देश्य किसी को दंडित करना नहीं बल्कि बेसहारा लोगों की मदद करना है। अंततः हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के पुराने आदेश को सही ठहराते हुए पति की याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।
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