मर्जी से शारीरिक संबंध बनाना दुष्कर्म नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, पीड़िता के बयानों ने पलट दी पूरी कहानी

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के एक मामले में महत्वपूर्ण व्यवस्था देते हुए कहा है कि यदि कोई महिला अपनी मर्जी से किसी के साथ जाती है और आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनते हैं, तो उसे अपहरण या बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने साफ किया कि प्रेम संबंधों के दौरान बनी शारीरिक नजदीकियों को बाद में अपराध का रूप नहीं दिया जा सकता, खासकर तब जब पीड़िता के आचरण से उसकी स्पष्ट सहमति झलकती हो। इस फैसले के साथ ही हाईकोर्ट ने रायपुर की निचली अदालत द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के निर्णय को बरकरार रखा है।

गरियाबंद जिले का था पूरा मामला

यह कानूनी विवाद गरियाबंद जिले के इंदागांव थाने से शुरू हुआ था। जनवरी 2022 में एक युवती ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि आरोपी धर्मेंद्र कुमार उसे मोटरसाइकिल पर बैठाकर अपने गांव ले गया। आरोप था कि वहां शादी का झांसा देकर उसके साथ दुष्कर्म किया गया। पीड़िता ने यह भी दावा किया था कि बाद में आरोपी ने उसकी जाति को लेकर टिप्पणी की और विवाह करने से इनकार कर दिया। इसके बाद पुलिस ने अपहरण, बलात्कार और एससी-एसटी एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी।

निचली अदालत के फैसले को सरकार ने दी थी चुनौती

रायपुर के विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी अत्याचार निवारण) ने अगस्त 2023 में सबूतों के अभाव और पीड़िता के विरोधाभासी बयानों को देखते हुए आरोपी धर्मेंद्र कुमार को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। राज्य सरकार ने इस फैसले को गलत बताते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। सरकार का तर्क था कि शादी का झूठा वादा करना सहमति को शून्य कर देता है, इसलिए इसे दुष्कर्म माना जाना चाहिए। हालांकि, हाईकोर्ट ने सरकारी अपील पर सुनवाई करते हुए तथ्यों का गहराई से अध्ययन किया।

मेडिकल रिपोर्ट में नहीं मिले जबरदस्ती के सबूत

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट का हवाला दिया। डॉक्टर द्वारा किए गए परीक्षण में पीड़िता के शरीर पर किसी भी प्रकार की आंतरिक या बाहरी चोट के निशान नहीं पाए गए थे। मेडिकल रिपोर्ट में जबरदस्ती यौन संबंध बनाने की पुष्टि नहीं हुई थी। आमतौर पर बलात्कार के मामलों में प्रतिरोध के दौरान आने वाली खरोंचें या चोट के निशान महत्वपूर्ण साक्ष्य होते हैं, लेकिन इस मामले में डॉक्टर के सामने पीड़िता ने स्वयं किसी भी प्रकार की जोर-जबरदस्ती की बात नहीं कही थी।

पीड़िता ने खुद स्वीकार किए प्रेम संबंध

केस की पूरी दिशा पीड़िता के अदालत में दिए गए बयानों से बदल गई। सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि पीड़िता और आरोपी के बीच पहले से प्रेम संबंध थे। वह अपनी मर्जी से आरोपी के साथ मोटरसाइकिल पर बैठकर गई थी और कई मौकों पर वह स्वयं रात में आरोपी से मिलने जाती थी। अदालत ने पाया कि पीड़िता एक वयस्क महिला है और उसे अपने कृत्यों के परिणामों की समझ थी। उसका आरोपी के साथ बार-बार जाना उसकी मर्जी और सहमति का स्पष्ट प्रमाण माना गया।

पुलिस और परिजनों के दबाव में दर्ज कराई रिपोर्ट

अदालत के सामने पीड़िता ने एक और चौंकाने वाला खुलासा किया। उसने स्वीकार किया कि पुलिस द्वारा लिखी गई शिकायत पर उसने केवल हस्ताक्षर किए थे। उसने यह भी माना कि पुलिस और परिजनों के कहने पर उसने शुरुआत में आरोपी के खिलाफ बयान दिए थे। इस स्वीकारोक्ति ने अभियोजन पक्ष के दावों की नींव हिला दी। कोर्ट ने माना कि जब मुख्य गवाह ही अपने दावों से पीछे हट जाए या दबाव की बात स्वीकार करे, तो सजा देना न्यायोचित नहीं है।

अभियोजन पक्ष अपराध सिद्ध करने में रहा विफल

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप तभी किया जा सकता है जब वह पूरी तरह अवैध हो। इस मामले में अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि आरोपी ने पीड़िता को डरा-धमकाकर या उसकी मर्जी के बिना उसका अपहरण किया था। चूंकि अपराध संदेह से परे सिद्ध नहीं हो सका, इसलिए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए आरोपी को बरी करने के फैसले को सही ठहराया।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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