
देश के पशुपालन क्षेत्र में एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। एसबीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी के हजारों मवेशी बीमा टैग (Cattle Tags) रहस्यमय तरीके से गायब हो गए हैं। ये टैग गायब होने की घटना किसी एक जगह नहीं, बल्कि पंजाब, कर्नाटक, तेलंगाना और मध्य प्रदेश समेत पांच राज्यों में हुई है। कंपनी ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए भोपाल, जालंधर, मैसूरु और खम्मम जैसे शहरों में एफआईआर दर्ज कराई है। इतनी बड़ी संख्या में टैग्स का गायब होना किसी साधारण लापरवाही की ओर नहीं, बल्कि एक सुनियोजित साजिश की ओर इशारा कर रहा है।
क्या है ये मवेशी टैग और क्यों है कीमती?
ग्रामीण इलाकों में मवेशियों को किसान का ‘एटीएम’ माना जाता है। जब भी किसी गाय या भैंस का बीमा होता है, तो उसकी पहचान के लिए उसके कान में प्लास्टिक का एक ‘ईयर टैग’ लगाया जाता है। इस टैग पर एक यूनिक आईडी नंबर होता है जो बीमा कंपनी के रिकॉर्ड में दर्ज रहता है। जानवर की मौत होने पर बीमा राशि का दावा करने के लिए इस टैग के साथ मृत मवेशी की तस्वीर दिखाना अनिवार्य होता है। यही वजह है कि इन टैग्स का गायब होना सीधे तौर पर फर्जी क्लेम के रास्ते खोल देता है।
संगठित गिरोह द्वारा फर्जी क्लेम की आशंका
बीमा विशेषज्ञों का मानना है कि गायब हुए टैग्स का इस्तेमाल अब फर्जी क्लेम के लिए किया जा सकता है। अपराधी इन चोरी के टैग्स को उन जानवरों के कान में लगा सकते हैं जो या तो मर चुके हैं या मरने वाले हैं। इसके बाद बिना किसी वास्तविक निरीक्षण के पुरानी तारीखों में बीमा पॉलिसी जारी करवाकर कंपनी से 50 हजार से लेकर 1 लाख रुपये तक का मुआवजा वसूला जा सकता है। यह पूरा खेल स्थानीय एजेंटों, बिचौलियों और कुछ भ्रष्ट कर्मचारियों की मिलीभगत के बिना मुमकिन नहीं लगता।
कंपनी ने जारी किया पब्लिक नोटिस
बड़ी संख्या में टैग्स की पूरी सीरीज गायब होने के बाद एसबीआई जनरल इंश्योरेंस ने एक सार्वजनिक सूचना जारी की है। कंपनी ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में अगर इन गायब हुए टैग नंबरों के आधार पर कोई भी बीमा दावा या क्लेम पेश किया जाता है, तो उसे तत्काल खारिज कर दिया जाएगा। कंपनी ने यह कदम अपनी कानूनी जिम्मेदारी से बचने और लोगों को जागरूक करने के लिए उठाया है। यह इस बात का सबूत है कि कंपनी को भी अंदरूनी तौर पर बड़े घोटाले का अंदेशा हो चुका है।

किसानों और सरकारी खजाने को भारी चोट
मवेशी बीमा अक्सर सरकारी योजनाओं के तहत कम प्रीमियम पर किया जाता है। अगर फर्जी क्लेम के जरिए करोड़ों रुपये लूटे जाते हैं, तो इसका सीधा बोझ सरकारी खजाने पर पड़ता है। इससे बीमा कंपनियों का घाटा बढ़ता है और अंततः ईमानदार किसानों के लिए बीमा प्रीमियम महंगा हो जाता है। सबसे ज्यादा नुकसान उन जरूरतमंद किसानों का होता है, जिन्हें उनके मवेशी की मौत पर वास्तविक मदद नहीं मिल पाती क्योंकि बजट का बड़ा हिस्सा फर्जीवाड़े की भेंट चढ़ जाता है।
जांच के घेरे में कंपनी के भीतर के लोग
इतनी दूरी और अलग-अलग राज्यों में एक साथ टैग्स का गायब होना यह बताता है कि इसका नेटवर्क बहुत गहरा है। पुलिस अब उन सभी पॉलिसी फाइलों की जांच कर रही है जिनमें इन संदिग्ध सीरीज के टैग्स का इस्तेमाल हुआ है। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि ये टैग कंपनी की कड़ी सुरक्षा से बाहर कैसे निकले? क्या इसमें कंपनी के अपने ही लोग शामिल हैं? जब तक इस पूरी प्रक्रिया में डिजिटल पारदर्शिता नहीं आएगी, तब तक बेजुबान जानवरों के नाम पर यह ‘टैग’ का काला कारोबार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाता रहेगा।



