
CG Census Rules Changed: छत्तीसगढ़ में होने वाली आगामी जनगणना को लेकर राज्य सरकार ने एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला लिया है। प्रदेश की सामाजिक और पारंपरिक मान्यताओं का सम्मान करते हुए गृह विभाग ने नियमों में महत्वपूर्ण ढील दी है। नई व्यवस्था के तहत अब किसी भी महिला को जनगणना के दौरान अपने पति या दिवंगत पति का नाम सार्वजनिक करने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। ग्रामीण और पारंपरिक अंचलों में आज भी कई महिलाएं लोक-मर्यादा के कारण पति का नाम लेने से संकोच करती हैं। महिलाओं की इसी असहजता को दूर करने के लिए प्रशासन ने यह कदम उठाया है ताकि बिना किसी हिचकिचाहट के सटीक आंकड़े जुटाए जा सकें।
महिला सदस्यों का नाम बताने की भी बाध्यता खत्म, संवेदनशीलता से काम करेंगे अधिकारी
सरकार ने स्पष्ट किया है कि केवल शादीशुदा महिलाएं ही नहीं, बल्कि परिवार के किसी भी पुरुष सदस्य को अपने घर की महिलाओं के नाम उजागर करने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। कई समाजों में घर की स्त्रियों का नाम बाहरी व्यक्तियों के सामने सीधे तौर पर नहीं लिया जाता, बल्कि रिश्तों के संदर्भ या संकेतों से उनकी पहचान कराई जाती है। इसी सांस्कृतिक बारीकी को समझते हुए प्रगणकों और जनगणना अधिकारियों को विशेष निर्देश दिए गए हैं। उनसे कहा गया है कि वे स्थानीय निवासियों पर किसी भी तरह का दबाव न बनाएं और बेहद शालीनता व संवेदनशीलता के साथ जरूरी डेटा दर्ज करें।
सामाजिक रियायत के बीच कानूनी कर्तव्य: सही जानकारी देना हर नागरिक की जिम्मेदारी
नियमों में सामाजिक छूट देने के साथ ही सरकार ने नागरिकों की कानूनी जवाबदेही भी तय की है। गृह विभाग के अनुसार, जनगणना अधिकारी द्वारा पूछे गए जायज सवालों का पूरी ईमानदारी और स्पष्टता से जवाब देना हर नागरिक का संवैधानिक कर्तव्य है। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर गलत जानकारी देता है, जरूरी तथ्यों को छिपाता है या भ्रामक आंकड़े प्रस्तुत करता है, तो इसे कानून का सीधा उल्लंघन माना जाएगा। चूंकि यह डेटा देश के विकास और भावी योजनाओं का मुख्य आधार होता है, इसलिए आंकड़ों की शुद्धता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
घरों में प्रवेश और नंबरिंग में देना होगा सहयोग, बाधा पहुंचाने पर लगेगा जुर्माना
जनगणना अधिनियम के कड़े प्रावधानों के तहत नागरिकों को अपने घरों में सर्वे टीम को प्रवेश देने की अनुमति देनी होगी। इसके अलावा मकानों की पहचान के लिए उन पर नंबर, विशेष चिन्ह या सरकारी निशान लगाने के काम में भी पूरा सहयोग करना होगा। यदि कोई व्यक्ति इस राष्ट्रीय कार्य में जानबूझकर रुकावट पैदा करता है, सवालों के जवाब देने से मुकरता है या दीवारों पर लिखे गए नंबरों को मिटाने की कोशिश करता है, तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने पर संबंधित व्यक्ति पर एक हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
लापरवाही बरतने वाले कर्मचारियों पर गिरेगी गाज, तीन साल की जेल का है प्रावधान
प्रशासन ने केवल जनता के लिए ही नहीं, बल्कि फील्ड में काम करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए भी सख्त अनुशासन तय किया है। यदि कोई सरकारी कर्मचारी अपनी ड्यूटी में लापरवाही बरतता है, जानबूझकर गलत आंकड़े दर्ज करता है या किसी नागरिक को अनावश्यक रूप से परेशान करता है, तो उसके खिलाफ कड़ा एक्शन लिया जाएगा। इस तरह की गंभीर कोताही के लिए दोषी कर्मियों को जुर्माने के साथ-साथ अधिकतम तीन साल तक की जेल की सजा भुगतनी पड़ सकती है। सरकार का मानना है कि इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अभियान में किसी भी स्तर पर ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जा सकती।
डेटा की गोपनीयता का पूरा भरोसा, अदालतों में भी साक्ष्य के रूप में नहीं होगा इस्तेमाल
नागरिकों के मन से हर तरह का डर निकालने के लिए गृह विभाग ने पूर्ण गोपनीयता का आश्वासन दिया है। अधिकारियों ने साफ किया है कि जनगणना के तहत तैयार किए गए रजिस्टर और व्यक्तिगत जानकारियां पूरी तरह सुरक्षित लॉक-एंड-की में रहेंगी और किसी भी बाहरी व्यक्ति या एजेंसी को इसकी जांच की अनुमति नहीं होगी। यहां तक कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 के प्रावधानों के बावजूद, इन व्यक्तिगत जानकारियों को किसी भी दीवानी या आपराधिक मामले में अदालत के भीतर सबूत के तौर पर पेश नहीं किया जा सकेगा। इस कानूनी सुरक्षा से लोग बिना किसी संकोच के अपनी सही आर्थिक और सामाजिक स्थिति दर्ज करा सकेंगे।



