
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ के संविदा और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए न्याय की एक बड़ी मिसाल सामने आई है। बिलासपुर स्थित गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के 109 कर्मचारियों ने अपनी नियमित सेवा को लेकर चल रही लंबी कानूनी लड़ाई जीत ली है। सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय प्रबंधन द्वारा दायर की गई ‘क्यूरेटिव पिटीशन’ को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत के इस कड़े रुख के बाद अब कर्मचारियों के नियमितीकरण का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है। यह फैसला उन कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है जो पिछले डेढ़ दशक से अपनी वाजिब हकदारी के लिए दफ्तरों से लेकर अदालतों के चक्कर काट रहे थे।
2008 से शुरू हुआ था विवाद: राज्य से केंद्रीय विश्वविद्यालय बनने के सफर में उलझ गया था नियमितीकरण का पेंच
इस पूरे विवाद की शुरुआत साल 2008 में हुई थी। छत्तीसगढ़ शासन के नियमों के तहत गुरु घासीदास विश्वविद्यालय के 109 दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को 26 अगस्त 2008 को नियमित किया गया था। कुछ ही समय बाद जनवरी 2009 में इस संस्थान को ‘केंद्रीय विश्वविद्यालय’ का दर्जा मिल गया। नियमानुसार ये सभी कर्मचारी नियमित सेवक के रूप में केंद्रीय सेटअप का हिस्सा बन गए। उन्होंने नियमित वेतन पर काम करना भी शुरू कर दिया था। लेकिन कुछ महीनों बाद ही प्रबंधन ने बिना किसी ठोस कारण या नोटिस के उनका नियमित वेतन रोक दिया और उन्हें दोबारा कलेक्टर दर (दैनिक वेतन) पर धकेल दिया गया, जिससे विवाद खड़ा हो गया।
बिना नोटिस वेतन में कटौती: अप्रैल 2009 से फिर मिलने लगी थी कलेक्टर दर, कर्मचारियों ने खटखटाया था हाईकोर्ट का दरवाजा
कर्मचारियों को मार्च 2009 तक नियमित वेतन के रूप में 8,209 रुपये मिले थे। इसके बाद अचानक विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनके पद को अमान्य करते हुए वेतन कम कर दिया। फरवरी 2010 में एक आदेश जारी कर उनके नियमितीकरण को पूरी तरह रद्द कर दिया गया। प्रबंधन की इस एकतरफा कार्रवाई के खिलाफ प्रभावित कर्मचारियों ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उनका तर्क था कि केंद्रीय विश्वविद्यालय अधिनियम 2009 की धारा 4(डी) के तहत उनकी सेवा शर्तें सुरक्षित हैं और उन्हें इस तरह से डिमोट (पद अवनत) करना पूरी तरह गैर-कानूनी है।
हाईकोर्ट की सिंगल और डबल बेंच का कड़ा रुख: 2023 में आया था पक्ष में फैसला, प्रबंधन के आदेशों को बताया था अवैध
लंबी सुनवाई के बाद 6 मार्च 2023 को हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि 2010 में नियमितीकरण रद्द करने का आदेश कानून की नजर में गलत है। कोर्ट ने आदेश दिया कि ये सभी 109 लोग 26 अगस्त 2008 से ही नियमित कर्मचारी माने जाएंगे और उन्हें तमाम एरियर व सेवा लाभ दिए जाएं। विश्वविद्यालय ने इस फैसले को डबल बेंच (खंडपीठ) में चुनौती दी, लेकिन वहां भी 21 जून 2023 को उनकी अपील खारिज कर दी गई। इसके बाद प्रबंधन इस मामले को लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट में भी नहीं गली दाल: एसएलपी और रिव्यू पिटीशन के बाद अब क्यूरेटिव भी हुई रद्द, अवमानना की लटकी तलवार
विश्वविद्यालय ने सुप्रीम कोर्ट में पहले एसएलपी (विशेष अनुमति याचिका) लगाई, जो मई 2024 में खारिज हुई। हार न मानते हुए प्रबंधन ने रिव्यू पिटीशन दायर की, उसे भी कोर्ट ने ठुकरा दिया। अंत में सबसे आखिरी कानूनी विकल्प के रूप में क्यूरेटिव पिटीशन का सहारा लिया गया, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर कर्मचारियों की नियमित सेवा को कानूनी रूप से अनिवार्य बना दिया है। अदालती आदेशों की अनदेखी करने पर कर्मचारियों ने पहले ही अवमानना याचिका दायर कर रखी है, जिसमें केंद्रीय शिक्षा सचिव और विश्वविद्यालय के कुलपति को नोटिस जारी किए जा चुके हैं।
कर्मचारियों को मिलेंगे सारे बकाया लाभ: 16 साल का एरियर और पेंशन के हकदार होंगे कर्मचारी, न्याय की हुई जीत
सुप्रीम कोर्ट के इस अंतिम फैसले के बाद अब विश्वविद्यालय के पास कर्मचारियों को नियमित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। इन 109 कर्मचारियों को अब 2008 से लेकर अब तक का पूरा पिछला वेतन अंतर (एरियर), इंक्रीमेंट और अन्य भत्ते मिलेंगे। यह जीत छत्तीसगढ़ के अन्य विभागों में कार्यरत संविदा कर्मचारियों के लिए भी एक उम्मीद की किरण है, जो नियमितीकरण की मांग कर रहे हैं। कर्मचारियों ने इस फैसले को सत्य की जीत बताया है और उम्मीद जताई है कि प्रशासन अब और देरी न करते हुए जल्द ही उनकी जॉइनिंग और बकाया भुगतान की प्रक्रिया पूरी करेगा।



