छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों का अकाल: 25 सालों में छत्तीसगढ़ में नहीं सुधर पाई स्वास्थ्य व्यवस्था, विशेषज्ञ डॉक्टरों के 1400 से ज्यादा पद खाली

छत्तीसगढ़ राज्य अपने गठन के 25वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है और आबादी तीन करोड़ के पार जा चुकी है, लेकिन प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था आज भी आईसीयू (ICU) में नजर आती है। मरीजों की बढ़ती तादाद के बीच सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों का भारी टोटा है। आलम यह है कि राजधानी रायपुर के दो सबसे बड़े अस्पताल, मेकाहारा और डीकेएस से पिछले दो वर्षों में 100 से ज्यादा विशेषज्ञ डॉक्टरों ने इस्तीफा दे दिया है। संविदा पर काम कर रहे ये डॉक्टर नियमितीकरण न होने और अनिश्चित भविष्य से तंग आकर सरकारी सेवा छोड़ रहे हैं। इस संकट ने राज्य के ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में स्वास्थ्य सेवाओं को पूरी तरह चरमरा दिया है।

विशेषज्ञ डॉक्टरों के 80 फीसदी पद खाली: संविदा के भरोसे चल रहा काम

विभागीय आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति बेहद डरावनी है। पूरे प्रदेश में विशेषज्ञ चिकित्सकों के कुल 1773 पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 1418 पद खाली पड़े हैं। यानी करीब 80 प्रतिशत पदों पर कोई विशेषज्ञ डॉक्टर तैनात नहीं है। वर्तमान में केवल 320 नियमित और 35 संविदा विशेषज्ञ ही पूरे राज्य की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। वहीं, चिकित्सा अधिकारियों (MO) के 2696 पदों में से 305 पद रिक्त हैं, लेकिन यहां भी 780 डॉक्टर केवल संविदा पर हैं। नियमित भर्ती की प्रक्रिया ठप होने से अनुभवी डॉक्टर अब छत्तीसगढ़ छोड़कर पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश का रुख कर रहे हैं, जहां उन्हें नौकरी की सुरक्षा और बेहतर सुविधाएं मिल रही हैं।

सुकमा में ‘जीरो’ विशेषज्ञ: बस्तर और सरगुजा के जिलों का बुरा हाल

स्वास्थ्य व्यवस्था का सबसे काला चेहरा बस्तर संभाग में देखने को मिलता है। सुकमा जिला एक ऐसा बदनसीब इलाका है जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों के 32 पद स्वीकृत तो हैं, लेकिन वहां एक भी विशेषज्ञ तैनात नहीं है। यही हाल बीजापुर का है, जहां 62 पदों के मुकाबले महज 3 डॉक्टर (1 नियमित और 2 संविदा) कार्यरत हैं। जशपुर में 76 में से 58 पद खाली हैं, वहीं मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में 76 विशेषज्ञ पदों में से 66 रिक्त पड़े हैं। इन इलाकों के गरीब मरीजों के पास इलाज के लिए रायपुर आने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता, जिससे राजधानी के अस्पतालों पर दबाव और बढ़ गया है।

हर साल तैयार हो रहे 4000 डॉक्टर, फिर भी अस्पतालों में क्यों है कमी?

एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स के अध्यक्ष डॉ. राकेश गुप्ता का कहना है कि प्रदेश में डॉक्टरों की कोई कमी नहीं है। हर साल राज्य के मेडिकल कॉलेजों से 3000 और बाहर से पढ़कर आने वाले करीब 1000 डॉक्टर छत्तीसगढ़ में तैयार हो रहे हैं। समस्या डॉक्टरों की उपलब्धता की नहीं, बल्कि सरकारी सिस्टम की है। प्रदेश में विशेषज्ञ डॉक्टरों का कोई अलग कैडर नहीं है और सुविधाओं की कमी के कारण डॉक्टर सरकारी नौकरी की जगह निजी प्रैक्टिस को चुन रहे हैं। विभाग ने कई बार इंटरव्यू लिए, लेकिन स्थायी भर्ती और पदोन्नति की स्पष्ट नीति न होने से कोई आने को तैयार नहीं है।

नियमितीकरण की मांग और बढ़ता असंतोष: डॉक्टरों में छाई निराशा

छत्तीसगढ़ डॉक्टर फेडरेशन के अध्यक्ष डॉ. हीरा सिंह लोधी के मुताबिक, डॉक्टरों में निराशा की सबसे बड़ी वजह प्रशासनिक सुस्ती है। लंबे समय से संविदा पर काम कर रहे चिकित्सक नियमित होने का इंतजार कर रहे हैं। जब उन्हें लगता है कि उनकी मेहनत का फल स्थायी नौकरी के रूप में नहीं मिलेगा, तो वे निजी अस्पतालों की ओर कदम बढ़ा देते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में स्वास्थ्य विभाग लगातार नियमित नियुक्तियां कर रहा है, जिससे वहां के डॉक्टरों को भविष्य की चिंता नहीं रहती। छत्तीसगढ़ में अनिश्चितता के माहौल ने स्वास्थ्य सेवाओं की कमर तोड़ दी है।

मरीजों पर दोहरी मार: लंबी कतारें और महीनों का इंतजार

अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी का सबसे बुरा असर गरीब मरीजों पर पड़ रहा है। जो मरीज निजी अस्पतालों का भारी-भरकम खर्च नहीं उठा सकते, उन्हें सरकारी अस्पतालों में छोटी सी जांच के लिए भी घंटों कतार में लगना पड़ता है। विशेषज्ञ न होने के कारण कई जटिल ऑपरेशनों के लिए मरीजों को महीनों बाद की तारीख दी जा रही है। बस्तर और सरगुजा जैसे दूरदराज के क्षेत्रों से आने वाले लोग अक्सर बिना इलाज के ही वापस लौटने को मजबूर हो जाते हैं। मौजूदा डॉक्टरों पर काम का बोझ इतना ज्यादा है कि वे चाहकर भी हर मरीज को पर्याप्त समय नहीं दे पा रहे हैं।

स्वास्थ्य मंत्री का दावा: जल्द पूरी होगी 300 पदों पर भर्ती

स्वास्थ्य संकट के इन तीखे सवालों पर मंत्री श्यामबिहारी जायसवाल का कहना है कि सरकार व्यवस्था को सुधारने के लिए गंभीर है। मंत्री के मुताबिक, जब से उन्होंने कार्यभार संभाला है, विशेषज्ञों की कमी दूर करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। फिलहाल 300 पदों पर भर्ती की प्रक्रिया जारी है और आने वाले समय में नियमित नियुक्तियों के लिए विज्ञापन जारी किए जाएंगे। सरकार का दावा है कि जनता के स्वास्थ्य के साथ कोई समझौता नहीं होगा, लेकिन धरातल पर खाली पड़े पद और डॉक्टरों का लगातार इस्तीफा देना कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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