
छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र में गुरुवार को आयुष्मान भारत योजना में कथित धांधली को लेकर सदन का माहौल गर्मा गया। प्रश्नकाल के दौरान बालोद जिले के अर्जुंदा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में सामने आई अनियमितताओं के मुद्दे पर विपक्ष ने सरकार को जमकर घेरा। विधायक कुंवर सिंह निषाद ने इस मामले को उठाते हुए इसे करोड़ों का घोटाला करार दिया और दोषियों के खिलाफ तुरंत पुलिस केस दर्ज करने की मांग की। हालांकि स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने साफ कर दिया कि जांच में कोई आर्थिक हेराफेरी नहीं पाई गई है इसलिए एफआईआर दर्ज करने का सवाल ही नहीं उठता।
बालोद में ‘फर्जी एंट्री’ का खेल: 70 करोड़ की गड़बड़ी का दावा
कांग्रेस विधायक कुंवर सिंह निषाद ने सदन में चौंकाने वाला दावा करते हुए कहा कि बालोद जिले में आयुष्मान योजना के नाम पर करीब 60 से 70 करोड़ रुपये की हेराफेरी की कोशिश की गई है। उन्होंने बताया कि मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खुद अस्पताल के कर्मचारी इस धांधली की शिकायत लेकर थाने पहुंचे थे। विपक्ष ने मांग की कि इतने बड़े पैमाने पर हुई अनियमितता की जांच के लिए विधानसभा की एक विशेष समिति बनाई जानी चाहिए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।
स्वास्थ्य मंत्री की सफाई: “नोटिस दिया गया है, पर घोटाला नहीं हुआ”
विपक्ष के तीखे हमलों का जवाब देते हुए स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने स्वीकार किया कि विभाग को अर्जुंदा स्वास्थ्य केंद्र से जुड़ी शिकायतें मिली थीं। उन्होंने बताया कि आंतरिक जांच में चार कर्मचारियों और अधिकारियों की लापरवाही सामने आई है। मंत्री के मुताबिक कुछ गलत एंट्री जरूर की गई थीं लेकिन भुगतान की प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही उन्हें पकड़ लिया गया। विभाग ने संबंधित प्रभारी अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है और भविष्य के लिए सख्त चेतावनी दी है।
तकनीकी पेच: कैसे बच गया सरकारी खजाना?
सदन में बहस के दौरान स्वास्थ्य मंत्री ने योजना की तकनीकी बारीकियों को समझाते हुए कहा कि आयुष्मान योजना में प्रोत्साहन राशि का भुगतान इतना आसान नहीं है। यह राशि सीधे किसी व्यक्ति के निजी खाते में नहीं जाती बल्कि एक लंबी सत्यापन प्रक्रिया से गुजरती है। मंत्री ने दावा किया कि चूंकि जांच में यह पाया गया कि कोई वास्तविक लेन-देन या भुगतान नहीं हुआ है, इसलिए इसे ‘वित्तीय अनियमितता’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। उन्होंने कहा कि केवल कागजी एंट्री के आधार पर किसी को जेल नहीं भेजा जा सकता।
FIR की मांग पर अड़ा विपक्ष: “बिना पुलिस जांच के सच कैसे आएगा?”
मंत्री के जवाब से असंतुष्ट विपक्षी विधायकों ने सदन में जमकर नारेबाजी की। कांग्रेस सदस्यों का तर्क था कि अगर अस्पताल का स्टाफ खुद शिकायत कर रहा है, तो इसका मतलब है कि पर्दे के पीछे कुछ बड़ा खेल चल रहा था। विपक्ष ने सवाल उठाया कि जब गड़बड़ी स्वीकार की जा रही है, तो विभाग एफआईआर दर्ज कराने से क्यों बच रहा है? उनका आरोप था कि सरकार रसूखदार अधिकारियों को बचाने की कोशिश कर रही है और बिना पुलिसिया जांच के इस ‘सिस्टमैटिक करप्शन’ का खुलासा नहीं हो पाएगा।
मंत्री के दो टूक: “FIR नहीं होगी, मामला बंद”
काफी देर तक चले हंगामे और दबाव के बावजूद स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल अपने रुख पर अडिग रहे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब सरकारी खजाने से एक भी रुपये का नुकसान नहीं हुआ है, तो आपराधिक मामला दर्ज करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता। मंत्री ने दो टूक लहजे में कहा कि इस मामले में किसी भी तरह की एफआईआर दर्ज नहीं कराई जाएगी। सरकार की इस घोषणा के बाद विपक्ष ने सदन में भारी असंतोष जाहिर किया जिससे कार्यवाही में कुछ देर के लिए गतिरोध बना रहा।
आयुष्मान योजना की साख पर सवाल
इस पूरी बहस ने प्रदेश में आयुष्मान योजना के क्रियान्वयन पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। भले ही सरकार किसी भी वित्तीय हानि से इनकार कर रही हो लेकिन ‘फर्जी एंट्री’ की बात स्वीकार करना यह बताता है कि सिस्टम में सेंधमारी की कोशिशें जारी हैं। अब देखना होगा कि बालोद से उठा यह मुद्दा आने वाले दिनों में क्या राजनीतिक मोड़ लेता है और क्या विभाग अपनी निगरानी प्रणाली को और सख्त करेगा।



