
बलौदाबाजार के कसडोल स्थित तुरतुरिया में छेरछेरा पुन्नी के अवसर पर विशाल मेले का आयोजन हो रहा है। यह स्थान न केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, बल्कि “संतान प्राप्ति” की मन्नत के लिए पूरे छत्तीसगढ़ में प्रसिद्ध है। लाखों श्रद्धालु ऊँची पहाड़ियों पर स्थित माता गढ़ के मंदिर में दर्शन के लिए पहुँच रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पौष पूर्णिमा के दिन यहाँ पूजा-अर्चना करने से भक्तों की मनोकामनाएं अवश्य पूरी होती हैं।
लव-कुश की जन्मस्थली: त्रेतायुग और रामायण काल का सजीव गवाह
इतिहासकारों और श्रद्धालुओं के लिए तुरतुरिया का विशेष महत्व महर्षि वाल्मीकि के आश्रम के कारण है। मान्यता है कि भगवान राम द्वारा माता सीता के परित्याग के बाद, उन्हें इसी आश्रम में आश्रय मिला था और यहीं लव-कुश का जन्म हुआ था। बलभद्र नदी के तट पर स्थित इस प्राचीन स्थल में आज भी रामायण काल की स्मृतियां पत्थरों और मूर्तियों के रूप में जीवित हैं, जो इसे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तीर्थ स्थल बनाती हैं।

नाम के पीछे का रहस्य: गोमुख से गिरती ‘तुरतुर’ करती जलधारा
इस स्थल का नाम ‘तुरतुरिया’ यहाँ की चट्टानों से निकलने वाले पानी की आवाज के कारण पड़ा है। बलभद्री नाले का जल जब संकरी सुरंगों से होकर गोमुख के माध्यम से जलकुंड में गिरता है, तो बुलबुलों के उठने से ‘तुर-तुर’ की ध्वनि निकलती है। यह प्राकृतिक संगीत पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। यहाँ का प्राचीन जलकुंड और कलात्मक ईंटों का काम प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करता है।
शिल्पकला की विरासत: भगवान विष्णु और प्राचीन कलाकृतियों का खजाना
तुरतुरिया का मंदिर परिसर मूर्तिकला का अद्भुत संग्रहालय है। यहाँ भगवान विष्णु की खड़ी प्रतिमा और शेषनाग पर विराजमान स्वरूप के दर्शन होते हैं। इसके साथ ही, परिसर में बड़ी संख्या में प्राचीन शिवलिंग और कलात्मक पाषाण स्तंभ बिखरे हुए हैं। पत्थरों पर उकेरी गई वीरों की गाथाएं और सिंह से लड़ते योद्धाओं की मूर्तियां उस समय की उत्कृष्ट शिल्पकला को दर्शाती हैं। पहाड़ियों से घिरा यह स्थान श्रद्धालुओं के साथ-साथ प्रकृति प्रेमियों के लिए भी किसी जन्नत से कम नहीं है।



