
छत्तीसगढ़ पुलिस की रफ्तार को बनाए रखने के लिए सरकार के खजाने से पानी की तरह पैसा बह रहा है। विधानसभा में पेश किए गए आंकड़ों ने सबको चौंका दिया है। महज़ एक साल के भीतर पुलिस विभाग ने वाहनों पर लगभग 350 करोड़ रुपये खर्च कर डाले हैं। इसमें सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि विभाग ने निजी गाड़ियाँ किराए पर लेने के लिए ही 130 करोड़ रुपये का भुगतान किया है। गृहमंत्री विजय शर्मा ने भाजपा विधायक राजेश मूणत के सवाल के जवाब में यह लिखित विवरण साझा किया है, जिससे विभाग के परिवहन प्रबंधन पर सवाल उठने लगे हैं।
करोड़ों का तेल और लाखों की मरम्मत
पुलिस विभाग के खर्चों का ब्यौरा देखें तो डीजल और पेट्रोल की खपत सबसे अधिक रही है। सरकारी और किराए के वाहनों को दौड़ाने के लिए साल भर में 148 करोड़ रुपये का ईंधन जलाया गया। वहीं, गाड़ियों की कंडोम हालत और लगातार इस्तेमाल की वजह से उनकी मरम्मत (Maintenance) पर भी 41 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। अन्य विविध मदों में भी 30 करोड़ रुपये का व्यय दर्ज किया गया है। यह भारी-भरकम खर्च तब है जब विभाग के पास खुद का एक बड़ा बेड़ा मौजूद है।
| मद (Expenditure Head) | खर्च की गई राशि (अनुमानित करोड़ में) |
| निजी वाहनों का किराया | ₹130 करोड़ |
| डीजल और पेट्रोल | ₹148 करोड़ |
| वाहनों की मरम्मत | ₹41 करोड़ |
| अन्य खर्च | ₹30 करोड़ |
| कुल योग | ₹350 करोड़ |
पुरानी गाड़ियाँ और किराए का बोझ
गृह विभाग के जवाब के अनुसार, छत्तीसगढ़ पुलिस के पास वर्तमान में 2,618 हल्के वाहन, 720 मध्यम वाहन, 364 भारी वाहन और 6,279 मोटरसाइकिलें उपलब्ध हैं। हालांकि, इनमें से बड़ी संख्या में गाड़ियाँ पुरानी हो चुकी हैं या उन्हें ‘कंडम’ घोषित करने की स्थिति आ गई है। इसी कमी को पूरा करने के लिए जिला पुलिस इकाइयाँ वित्त विभाग के नियमों के तहत निजी गाड़ियाँ किराए पर लेती हैं। रायपुर और बीजापुर जैसे जिलों में यह खर्च सबसे अधिक देखा गया है।
जिलों में खर्च का हिसाब-किताब
जिलों के आंकड़ों पर नजर डालें तो राजधानी रायपुर और नक्सल प्रभावित बीजापुर एवं नारायणपुर में किराए के वाहनों पर सबसे ज्यादा पैसा खर्च हुआ है। रायपुर में जहां वीआईपी मूवमेंट और अपराध नियंत्रण के लिए भारी संख्या में गाड़ियाँ लगी हैं, वहीं बस्तर संभाग के जिलों में दुर्गम रास्तों और सुरक्षा कारणों से किराए के वाहनों का सहारा लेना पड़ रहा है।
| जिला (District) | वाहनों की संख्या | किराए पर कुल खर्च (लगभग) |
| रायपुर (ग्रामीण सहित) | 6,600 | ₹15.51 करोड़ |
| बीजापुर | 6,997 | ₹26.30 करोड़ |
| नारायणपुर | 6,809 | ₹8.50 करोड़ |
| बस्तर | 3,881 | ₹7.46 करोड़ |
| बिलासपुर | 3,199 | ₹6.35 करोड़ |
| दुर्ग | 2,300 | ₹3.47 करोड़ |
बस्तर संभाग में ईंधन की भारी खपत
बस्तर संभाग के जिलों में सरकारी गाड़ियों के मुकाबले निजी (किराए की) गाड़ियों के डीजल-पेट्रोल पर कहीं ज्यादा खर्च हो रहा है। उदाहरण के लिए, बीजापुर में सरकारी गाड़ियों के लिए 5.63 करोड़ का तेल लगा, जबकि वहीं निजी गाड़ियों के लिए यह आंकड़ा 11.52 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यही स्थिति नारायणपुर और कांकेर में भी देखने को मिली है। नक्सल विरोधी अभियानों में निजी वाहनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल इस खर्च का मुख्य कारण माना जा रहा है।
मरम्मत और अन्य मदों में खर्च
सिर्फ तेल और किराया ही नहीं, बल्कि गाड़ियों के रखरखाव ने भी बजट बिगाड़ा है। रायपुर कमिश्नरेट में मरम्मत पर 55.08 लाख रुपये खर्च हुए, जबकि सुकमा जैसे जिलों में यह राशि 38.84 लाख रुपये रही। कई जिलों में अन्य खर्चों के नाम पर भी लाखों रुपये निकाले गए हैं। बिलासपुर जैसे जिलों में एक दिलचस्प आंकड़ा यह है कि वहां निजी वाहनों पर डीजल का खर्च शून्य दिखाया गया है, जबकि सरकारी गाड़ियों पर 2.17 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं।
क्या नई गाड़ियों की है जरूरत?
इस भारी-भरकम खर्च ने एक नई बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि हर साल 130 करोड़ रुपये किराए पर खर्च करने के बजाय यदि पुलिस विभाग अपने बेड़े में नई गाड़ियाँ शामिल करे, तो लंबे समय में सरकारी धन की बचत हो सकती है। फिलहाल, पुरानी गाड़ियों की मरम्मत और किराए का बढ़ता बोझ पुलिस के बजट पर भारी पड़ रहा है। आने वाले समय में देखना होगा कि क्या सरकार पुलिस के परिवहन तंत्र को सुधारने के लिए कोई ठोस ठोस कदम उठाती है।



