
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में साल 2014 में हुए उस रूह कपा देने वाले ‘नसबंदी कांड’ में न्याय की घड़ी आ गई है। 12 साल के लंबे इंतजार और लंबी कानूनी लड़ाई के बाद कोर्ट ने मुख्य आरोपी डॉ. आरके गुप्ता को दोषी पाया है। प्रथम सत्र न्यायाधीश शैलेश केतारप की अदालत ने डॉ. गुप्ता पर गैर इरादतन हत्या के आरोपों को सही ठहराया। हालांकि, इस चर्चित मामले में आरोपी बनाए गए पांच अन्य लोगों को साक्ष्यों के अभाव में दोषमुक्त (बरी) कर दिया गया है। यह घटना उस वक्त केवल प्रदेश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में रही थी।
85 ऑपरेशन और 18 मौतें: जब मातम में बदली खुशियां
साल 2014 के नवंबर महीने में सकरी स्थित नेमीचन्द जैन अस्पताल में नसबंदी शिविर का आयोजन किया गया था। इस सरकारी शिविर में कुल 85 महिलाओं और पुरुषों की नसबंदी की गई थी। ऑपरेशन के कुछ ही घंटों बाद मरीजों की तबीयत बिगड़ने लगी और देखते ही देखते 13 महिलाओं सहित कुल 18 लोगों ने दम तोड़ दिया। इस भयानक मंजर ने पूरे देश को झकझोर दिया था। जांच में पाया गया कि डॉक्टर ने बेहद कम समय में और लापरवाही के साथ ये ऑपरेशन किए थे, जो मानकों के खिलाफ थे।
डॉ. आरके गुप्ता पर गैर इरादतन हत्या का दोष सिद्ध
अदालत ने अपने फैसले में डॉ. आरके गुप्ता की कार्यप्रणाली को गंभीर लापरवाही माना। अतिरिक्त शासकीय अधिवक्ता देवेंद्र राव सोमावार ने पुष्टि की है कि जांच के दौरान डॉ. गुप्ता के खिलाफ धारा 304 (गैर इरादतन हत्या) के तहत साक्ष्य पर्याप्त पाए गए। कोर्ट ने माना कि एक जिम्मेदार डॉक्टर होने के नाते उन्हें पता था कि असुरक्षित परिस्थितियों और जल्दबाजी में किए गए ऑपरेशन जानलेवा हो सकते हैं। जहां डॉ. गुप्ता को दोषी पाया गया, वहीं इस मामले से जुड़े अन्य पांच कर्मचारी और डॉक्टर बरी कर दिए गए हैं।
राहुल गांधी पहुंचे थे बिलासपुर, रमन सरकार ने बिठाई थी जांच
नसबंदी कांड के बाद तत्कालीन भाजपा सरकार और मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह विपक्षी दलों के निशाने पर आ गए थे। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने स्वयं बिलासपुर का दौरा कर मृतकों के परिजनों का दर्द साझा किया था। चौतरफा दबाव के बाद तत्कालीन सरकार ने मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए थे। कई समाजसेवी संस्थाओं ने इस मामले को लेकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और स्वास्थ्य विभाग की लचर व्यवस्था पर सवाल उठाए थे।
जांच में खुलासा: ‘सिप्रोसीन’ दवा ने लिया था जहर का रूप
नसबंदी कांड की जांच करने वाली विशेष समिति ने अपनी रिपोर्ट में एक बड़ा खुलासा किया था। रिपोर्ट के अनुसार, नसबंदी के बाद मरीजों को ‘सिप्रोसीन’ (Ciprocine) नाम की एंटीबायोटिक दवा दी गई थी। जांच में पता चला कि इस दवा में मिलावट थी और इसे खाने के बाद ही 13 महिलाओं की मौत हुई। न केवल इस शिविर में, बल्कि झोलाछाप डॉक्टरों से इसी दवा का इलाज कराने वाले कुछ अन्य ग्रामीणों की भी मौत की खबरें सामने आई थीं।
दवा कंपनी के संचालक और लैब मालिकों पर गिरी गाज
दवा में मिलावट की पुष्टि होने के बाद पुलिस ने सिप्रोसीन बनाने वाली कंपनी ‘महावर फार्मा’ के संचालक रमेश महावर पर शिकंजा कसा था। इसके साथ ही दवा बेचने वाले दुकानदार और कविता लैबोरेटरी के संचालक राकेश खरे और राजेश के खिलाफ भी कार्रवाई की गई थी। कोर्ट में चले लंबे ट्रायल के दौरान यह साबित करने की कोशिश की गई कि मौत का मुख्य कारण केवल डॉक्टर की लापरवाही नहीं, बल्कि जहरीली दवा भी थी।
राष्ट्रपति के ‘दत्तक पुत्रों’ पर भी गिरी थी निलंबन की गाज
इस मामले की जांच के दौरान प्रशासनिक स्तर पर भी कई बड़े एक्शन लिए गए थे। तत्कालीन सीएमएचओ सहित कई डॉक्टरों को सस्पेंड किया गया था। इनमें विशेष रूप से राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहे जाने वाले बैगा जनजाति के डॉक्टर धर्मवीर सिंह ध्रुव और राजेश छत्रिय का निलंबन चर्चा में रहा था। डॉ. धर्मवीर ने उस समय राष्ट्रपति को पत्र लिखकर खुद को निर्दोष बताते हुए सिस्टम द्वारा फंसाने का आरोप लगाया था।
12 साल की कानूनी लड़ाई और न्याय की उम्मीद
पीड़ित परिवारों के लिए यह फैसला कड़वी यादों के साथ न्याय की एक छोटी सी किरण लेकर आया है। 12 साल तक चली इस सुनवाई में सैकड़ों गवाहों और बयानों को दर्ज किया गया। कोर्ट के इस फैसले ने सरकारी स्वास्थ्य शिविरों की व्यवस्था और डॉक्टरों की जवाबदेही पर एक बार फिर से बड़ी लकीर खींच दी है। हालांकि, पांच अन्य आरोपियों के बरी होने से कुछ पीड़ित पक्ष असंतुष्ट नजर आ रहे हैं और मामले को ऊपरी अदालत में ले जाने की चर्चा भी तेज हो गई है।



