
छत्तीसगढ़ में आयुष्मान भारत योजना के तहत इलाज करने वाले निजी अस्पतालों के सब्र का बांध अब टूट गया है। पिछले कई महीनों से करोड़ों रुपये का भुगतान लंबित होने के कारण अस्पतालों के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर इंडिया (AHPI) ने साफ किया है कि बार-बार गुहार लगाने के बाद भी सरकार की ओर से बकाया राशि जारी नहीं की गई है। इस लापरवाही के विरोध में प्रदेश भर के निजी अस्पताल संचालकों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है।
30 जनवरी को काली पट्टी बांधकर होगा प्रदर्शन
रविवार को हुई एक हाई-प्रोफाइल बैठक में एसोसिएशन ने सर्वसम्मति से विरोध का रास्ता चुना है। आगामी 30 जनवरी 2026 को छत्तीसगढ़ के सभी निजी अस्पतालों में डॉक्टर और स्टाफ काली पट्टी बांधकर काम करेंगे। यह विरोध प्रदर्शन प्रतीकात्मक होगा, लेकिन अस्पतालों ने उस दिन रूटीन कामकाज बंद रखने का भी फैसला किया है। अस्पताल प्रबंधन आने वाले मरीजों से अपील करेगा कि वे केवल अनिवार्य होने पर ही आएं या अगले दिन के लिए अपॉइंटमेंट लें। हालांकि, मानवीय आधार पर आपातकालीन सेवाओं को इस बंद से मुक्त रखने की कोशिश की जाएगी।
अस्पताल संचालकों की मुख्य मांगें और आपत्तियां
अस्पताल संचालकों ने सरकार के सामने अपनी मांगों की एक सूची रखी है। उनका कहना है कि जब तक व्यवस्था पारदर्शी नहीं होगी, तब तक अस्पतालों का संचालन करना असंभव होगा। उनकी प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:
- समयबद्ध भुगतान: महतारी वंदन योजना की तर्ज पर हर महीने एक निश्चित तारीख को आयुष्मान राशि का भुगतान किया जाए।
- बकाया राशि का निपटारा: महीनों से अटकी हुई फाइलों को क्लियर कर तुरंत फंड जारी किया जाए।
- पारदर्शी सिस्टम: भुगतान प्रक्रिया में देरी के कारणों और फाइलों की स्थिति जानने के लिए एक स्पष्ट ट्रैकिंग सिस्टम हो।
- दवाइयों और स्टाफ का खर्च: लंबित राशि की वजह से स्टाफ को वेतन देने और दवाइयां खरीदने में आ रही बाधा को दूर किया जाए।
महतारी वंदन योजना जैसा नियमित मॉडल अपनाने की मांग
एसोसिएशन ने राज्य सरकार को सुझाव दिया है कि आयुष्मान योजना के भुगतान के लिए भी ‘महतारी वंदन योजना‘ जैसा सटीक मॉडल अपनाया जाए। संचालकों का कहना है कि जिस तरह महिलाओं को हर महीने तय समय पर पैसा मिलता है, वैसी ही गंभीरता स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति भी दिखाई जानी चाहिए। वर्तमान में भुगतान प्रक्रिया में कोई निश्चित समय-सीमा तय न होने के कारण फाइलें एक टेबल से दूसरे टेबल तक महीनों भटकती रहती हैं, जिससे छोटे और मध्यम दर्जे के अस्पताल बंद होने की कगार पर पहुंच गए हैं।
मरीजों की सेवाओं पर पड़ रहा सीधा असर
इस पूरे विवाद का सबसे दुखद पहलू मरीजों को होने वाली असुविधा है। अस्पताल संचालकों का तर्क है कि जब उनके पास नई दवाइयां खरीदने या आधुनिक उपकरणों के रखरखाव के लिए पैसे नहीं होंगे, तो वे बेहतर इलाज कैसे दे पाएंगे। भुगतान में अनियमितता के कारण कई अस्पतालों ने अब नए मरीजों को भर्ती करने में कतराना शुरू कर दिया है। अगर 30 जनवरी के विरोध के बाद भी सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो आने वाले समय में स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह ठप हो सकती हैं।
सरकार को दी गई कड़े आंदोलन की चेतावनी
एसोसिएशन ने स्पष्ट कर दिया है कि 30 जनवरी का प्रदर्शन केवल एक शुरुआत है। यदि शासन-प्रशासन ने भुगतान की एक स्थायी प्रणाली विकसित नहीं की, तो भविष्य में निजी अस्पताल आयुष्मान योजना से पूरी तरह हाथ पीछे खींच सकते हैं। फिलहाल राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। अब देखना होगा कि क्या सरकार बजट सत्र से पहले इस विवाद को सुलझा पाती है या मरीजों की मुश्किलें और बढ़ेंगी।



