
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में अपनी नियुक्ति की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे डीएड (D.El.Ed.) अभ्यर्थियों और पुलिस के बीच शुक्रवार को भारी तनाव देखने को मिला। चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर तूता धरना स्थल से शीतला मंदिर तक निकाली जा रही ‘न्याय कलश यात्रा’ को पुलिस ने बैरिकेड्स लगाकर गेट पर ही रोक दिया। पिछले 86 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे ये अभ्यर्थी 2300 सहायक शिक्षक पदों पर बहाली की मांग कर रहे हैं। पुलिस की इस कार्रवाई से नाराज युवाओं ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए पूछा कि क्या अब हिंदू आस्था और परंपराओं का पालन करना भी अपराध हो गया है।

न पोस्टर, न बैनर: सिर पर कलश लिए न्याय मांगने निकले थे युवा
हाथों में पीला कलश, माथे पर तिलक और जुबान पर मंत्रोच्चार लिए ये अभ्यर्थी पूरी तरह भक्ति भाव में डूबे थे। इस यात्रा में न तो कोई राजनीतिक बैनर था और न ही कोई भड़काऊ पोस्टर। जशपुर, बलरामपुर, बस्तर और सुकमा जैसे दूर-दराज के जिलों से आए ये युवा केवल मां शीतला के चरणों में अर्जी लगाने जा रहे थे। अभ्यर्थियों का कहना था कि जब इंसान थक जाता है, तो वह ईश्वर की शरण में जाता है, लेकिन प्रशासन ने उन्हें मंदिर तक जाने से भी रोक दिया। भीषण गर्मी और कड़कती धूप के बीच पांच घंटे तक अभ्यर्थी सड़क पर ही कलश लिए बैठे रहे।
86 दिनों का अनशन और 2300 पदों की लड़ाई: क्या है पूरा विवाद?
सहायक शिक्षक भर्ती परीक्षा पास करने वाले ये अभ्यर्थी पिछले करीब तीन महीने से रायपुर में डेरा डाले हुए हैं। इनका दावा है कि विभाग में 2300 पद अब भी खाली पड़े हैं, जिन पर उनकी नियुक्ति होनी चाहिए। अभ्यर्थियों के अनुसार, इस मामले में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश उनके पक्ष में हैं, लेकिन शिक्षा विभाग के अधिकारी कोर्ट की अवमानना कर रहे हैं और योग्य युवाओं का भविष्य अधर में लटका हुआ है। इसी संवैधानिक हक की लड़ाई को वे अब आध्यात्मिक मार्ग से लड़ रहे थे।

पुलिस की भारी घेराबंदी: सुरक्षा के नाम पर बैरिकेडिंग और लाठियां
प्रशासन ने कलश यात्रा की सूचना मिलते ही तूता धरना स्थल के चारों ओर भारी पुलिस बल तैनात कर दिया था। जैसे ही पदयात्रियों का जत्था गेट की ओर बढ़ा, पुलिस ने लोहे के ऊंचे बैरिकेड्स लगाकर रास्ता जाम कर दिया। अधिकारियों का तर्क है कि बिना पूर्व अनुमति के किसी भी प्रकार की यात्रा या जुलूस निकालने की मनाही है और सुरक्षा कारणों से उन्हें आगे बढ़ने नहीं दिया गया। अभ्यर्थियों और महिला पुलिसकर्मियों के बीच इस दौरान जमकर बहस और झूमाझपटी भी हुई, जिससे माहौल काफी संवेदनशील हो गया।
‘दोहरा मापदंड’ का आरोप: राजनीतिक रैलियों पर क्यों नहीं लगती रोक?
प्रदर्शनकारी युवाओं ने सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा कि क्या अब नवरात्रि के पवित्र पर्व पर कलश यात्रा निकालना भी अनुमति का मोहताज होगा? अभ्यर्थियों का तर्क है कि जब बड़ी राजनीतिक पार्टियों की रैलियां होती हैं या वीआईपी मूवमेंट होता है, तब नियम-कानून ताक पर रख दिए जाते हैं। लेकिन जब अपनी हक की मांग कर रहे पढ़े-लिखे युवा शांतिपूर्ण ढंग से मंदिर जाना चाहते हैं, तो प्रशासन को कानून की याद आ जाती है। उन्होंने इसे हिंदू आस्था के साथ खिलवाड़ बताया।

बस्तर से सरगुजा तक के अभ्यर्थी शामिल: परिवार की उम्मीदें दांव पर
इस आंदोलन में केवल रायपुर के ही नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के अंतिम छोर से आए युवा शामिल हैं। बस्तर, बीजापुर, कोरिया और नारायणपुर जैसे नक्सल प्रभावित और पिछड़े क्षेत्रों से आए इन अभ्यर्थियों का कहना है कि उनके माता-पिता ने बड़ी उम्मीदों से उन्हें पढ़ाया-लिखाया है। 86 दिनों से घर-बार छोड़कर सड़क पर बैठे इन युवाओं का स्वास्थ्य भी अब बिगड़ने लगा है। कई अभ्यर्थी अनशन के कारण अस्पताल में भर्ती हो चुके हैं, लेकिन शासन की ओर से अब तक कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला है।
आस्था बनाम प्रशासन: क्या निकलेगा समाधान?
कलश यात्रा रोके जाने के बाद अभ्यर्थियों ने वहीं सड़क पर बैठकर भजन-कीर्तन शुरू कर दिया। उन्होंने साफ किया कि उनकी यह ‘न्याय कलश यात्रा’ तब तक जारी रहेगी जब तक विभाग नियुक्ति पत्र जारी नहीं कर देता। वहीं, पुलिस प्रशासन का कहना है कि वे केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। आस्था और अधिकार की इस जंग ने अब राजनीतिक मोड़ ले लिया है, जिससे सरकार पर दबाव बढ़ता जा रहा है। आने वाले दिनों में यह आंदोलन और भी उग्र रूप ले सकता है।
कोर्ट के आदेशों की अनदेखी का आरोप
अभ्यर्थियों का मुख्य आक्रोश शिक्षा विभाग के अधिकारियों के प्रति है। उनका कहना है कि जब देश की सबसे बड़ी अदालत ने उनके पक्ष में टिप्पणी की है, तो विभाग जानबूझकर देरी क्यों कर रहा है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि मुख्यमंत्री खुद इस मामले में हस्तक्षेप करें और अधिकारियों की मनमानी पर लगाम लगाएं। अभ्यर्थियों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही समाधान नहीं निकला, तो वे आमरण अनशन को और तेज करेंगे और इसकी जिम्मेदारी पूरी तरह शासन-प्रशासन की होगी।
खाली हाथ लौटे या मिलेगा न्याय?
शाम ढलने तक पुलिस और अभ्यर्थियों के बीच गतिरोध बना रहा। प्रशासन ने उन्हें शांत करने की कोशिश की, लेकिन युवाओं का कहना था कि वे अब केवल आदेश पत्र लेकर ही वापस लौटेंगे। इस घटना ने एक बार फिर बेरोजगार युवाओं के संघर्ष और प्रशासनिक संवेदनशीलता के बीच की खाई को उजागर कर दिया है। नवरात्रि के इस माहौल में अपनी मांगों के लिए संघर्ष कर रहे इन युवाओं की आवाज अब पूरे प्रदेश में गूंज रही है।



