Deficient Rain Affect Paddy Sowing: मानसून की बेरुखी से प्रभावित छत्तीसगढ़ में धान की बुआई, औसत वर्षा मात्र 54% रही

Deficient Rain Affect Paddy Sowing: छत्तीसगढ़ में इस मानसून सीजन में अब तक सिर्फ 55 मिमी औसत बारिश हुई है, जो पिछले दस वर्षों के इसी अवधि की औसत 101 मिमी का केवल 54 प्रतिशत है। राज्य के 33 जिलों में से अधिकांश जिलों में वर्षा सामान्य से काफी कम दर्ज हुई है, जिससे खरीफ फसलों की बुआई पर असर पड़ा है। खासतौर पर धान की बुआई लक्ष्य के मुकाबले काफी पीछे है।

धान की बुआई में भारी कमी, किसानों की बढ़ी चिंता

प्रदेश में कुल 39 लाख हेक्टेयर में धान की बुआई का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन बारिश की कमी के कारण अब तक केवल करीब 70 हजार हेक्टेयर में ही बुआई हो सकी है। अल्प और खंडित वर्षा ने किसानों की परेशानियां बढ़ा दी हैं। किसानों की नजर अब अच्छी बारिश पर टिकी हुई है, जिससे वे खरीफ की बाकी फसलों की बुआई जल्द से जल्द कर सकें।

राज्य के ज्यादातर जिलों में औसत से कम बारिश

राजस्व और आपदा प्रबंधन विभाग के बाढ़ नियंत्रण कक्ष की रिपोर्ट के मुताबिक, छत्तीसगढ़ के 33 जिलों में से केवल पांच जिलों में ही औसत वर्षा दर्ज हुई है। नारायणपुर में सबसे कम 8.6 प्रतिशत औसत वर्षा दर्ज की गई है, जबकि सुकमा में 11, बेमेतरा में 16, धमतरी में 18, कोंडागांव में 19 प्रतिशत औसत वर्षा रही।

जशपुर में सबसे ज्यादा और नारायणपुर में सबसे कम बारिश

जशपुर जिले में इस मानसून में अब तक सर्वाधिक 188.4 मिमी बारिश रिकॉर्ड की गई है। वहीं नारायणपुर में मात्र 13.5 मिमी वर्षा हुई है। सरगुजा, बलरामपुर, कोरिया, रायगढ़ जैसे जिलों में औसत वर्षा सामान्य से अधिक दर्ज हुई, जबकि बिलासपुर, मुंगेली, बेमेतरा, राजनांदगांव, मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जैसे कई जिलों में 30 प्रतिशत से भी कम बारिश दर्ज हुई है।

बारिश की कमी से खरीफ फसलों की बुआई पर संकट

मानसून की असामयिक और कम बारिश ने किसानों की उम्मीदों को झटका दिया है। धान के अलावा अन्य खरीफ फसलों की बुआई में भी देरी हो रही है। अगर आगे बारिश नहीं हुई तो फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे किसानों की आमदनी पर असर पड़ेगा।

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Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

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