
बाल शिक्षा और बच्चों के सर्वांगीण विकास को लेकर धमतरी जिले द्वारा शुरू की गई एक अनूठी पहल अब पूरे छत्तीसगढ़ के लिए मिसाल बन गई है। जिले में सफलतापूर्वक लागू किए गए ‘बाला’ (Building as Learning Aid) कॉन्सेप्ट की सफलता को देखते हुए राज्य सरकार ने इसे पूरे प्रदेश में लागू करने का निर्णय लिया है। छत्तीसगढ़ शासन के पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने इस संबंध में आधिकारिक निर्देश जारी कर दिए हैं। अब प्रदेश की सभी ग्राम पंचायतों में महात्मा गांधी नरेगा के तहत बनने वाली आंगनबाड़ियों को इसी विशेष डिजाइन के आधार पर तैयार किया जाएगा।
क्या है बाला कॉन्सेप्ट और कैसे बदलेंगी आंगनबाड़ियां?
‘बाला’ कॉन्सेप्ट का मुख्य उद्देश्य भवन की संरचना को ही बच्चों के लिए एक शिक्षण सामग्री (Teaching Aid) के रूप में विकसित करना है। इसके अंतर्गत आंगनबाड़ी की दीवारों पर वर्णमाला, गिनती, रंगीन आकृतियां और स्थानीय लोककथाओं के चित्र उकेरे जाते हैं। फर्श पर खेल-आधारित सीखने के उपकरण बनाए जाते हैं, जबकि खिड़की और दरवाजों को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि बच्चे उनके माध्यम से आकार और माप की बुनियादी समझ विकसित कर सकें। इस नवाचार से आंगनबाड़ी भवन केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा न रहकर एक जीवंत पाठशाला बन जाता है।

15 मार्च तक निर्माण कार्य पूर्ण करने के सख्त निर्देश
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने समय-सीमा को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। विभाग ने निर्देश दिया है कि नरेगा के तहत निर्माणाधीन सभी आंगनबाड़ी भवनों का काम 15 मार्च 2026 तक अनिवार्य रूप से पूर्ण कर लिया जाए। शासन ने स्पष्ट किया है कि निर्माण कार्यों में तकनीकी डिजाइन और निर्धारित वित्तीय नियमों का कड़ाई से पालन होना चाहिए। गुणवत्ता से किसी भी प्रकार का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सभी जनपद और ग्राम पंचायतों को युद्ध स्तर पर काम करने को कहा गया है।
कलेक्टर अविनाश मिश्रा ने साझा किए धमतरी के अनुभव
धमतरी कलेक्टर अविनाश मिश्रा ने इस पहल पर खुशी जताते हुए कहा कि जिले में बाला कॉन्सेप्ट के बहुत ही सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं। उन्होंने बताया कि इस नवाचार के बाद आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों की उपस्थिति में भारी बढ़ोत्तरी हुई है। खेल-खेल में सीखने की वजह से बच्चों की बौद्धिक क्षमता और रचनात्मकता में सुधार हुआ है। इसके साथ ही, आंगनबाड़ियों के बदलते स्वरूप को देखकर अभिभावक भी काफी संतुष्ट हैं। धमतरी की इस सफलता ने ही इसे ‘स्टेट मॉडल’ बनाने का मार्ग प्रशस्त किया है।
स्थानीय कलाकारों और समुदाय की ली जाएगी मदद
आंगनबाड़ी केंद्रों को आकर्षक और ज्ञानवर्धक बनाने के लिए स्थानीय समुदाय और कलाकारों की सहभागिता पर विशेष जोर दिया जा रहा है। शासन के निर्देशों के अनुसार, दीवारों पर की जाने वाली पेंटिंग और कलाकृतियों में स्थानीय संस्कृति की झलक होनी चाहिए ताकि बच्चे अपने परिवेश से जुड़ाव महसूस कर सकें। महिला एवं बाल विकास विभाग के साथ समन्वय बिठाकर जनप्रतिनिधियों को भी इस अभियान से जोड़ा जा रहा है, जिससे इस पहल को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाया जा सके।
बच्चों की रचनात्मकता और बौद्धिक विकास पर फोकस
इस पूरी योजना का मूल मंत्र बच्चों के भीतर जिज्ञासा और सीखने की ललक पैदा करना है। परंपरागत क्लासरूम के बजाय जब बच्चा अपने आसपास की दीवारों और जमीन पर ज्ञानवर्धक चीजें देखता है, तो उसका मानसिक विकास स्वाभाविक रूप से होता है। शासन का मानना है कि आंगनबाड़ी केंद्रों को ‘जीवंत शिक्षण प्रयोगशाला’ के रूप में विकसित करने से ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा की नींव मजबूत होगी। 15 मार्च के बाद प्रदेश की आंगनबाड़ियों का चेहरा पूरी तरह बदला हुआ नजर आएगा।



