Dhamtari Sihawa Dussehra Tradition: धमतरी जिले का अनोखा गांव, जहां रावण का दहन के बजाय सहस्त्रबाहु की नग्न प्रतिमा का किया जाता वध

Sahastrabahu Vadh Tradition Dhamtari: देशभर में विजय दशमी के पावन पर्व पर बुराई के प्रतीक रावण के पुतले का दहन कर धूमधाम से दशहरा मनाया जाता है। लेकिन छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के सिहावा अंचल में स्थित भीतररास गांव की परंपरा इन सभी से बिल्कुल जुदा है। यहां दशमी के दिन नहीं बल्कि एकादशी तिथि पर दशहरा मनाने की सदियों पुरानी परंपरा चली आ रही है। इस दिन यहां रावण दहन की बजाय सहस्त्रबाहु की नग्न प्रतिमा का खड्ग से वध किया जाता है, जिसे देखने के लिए दूर-दराज से लोग पहुंचते हैं।

दशमी के स्थान पर एकादशी के दिन मनाया जाता है यहां का दशहरा

Dhamtari Unique Cultural Tradition Dussehra: आम तौर पर सभी जगहों पर विजयादशमी के दिन ही रावण दहन और मेलों का समापन हो जाता है, किंतु धमतरी जिले के सिहावा क्षेत्र का भीतररास गांव अपनी इस विशिष्ट धार्मिक परंपरा के लिए पूरे राज्य में जाना जाता है। एकादशी के दिन सुबह से ही इस गांव में भारी भीड़ जुटने लगती है। परंपरागत विधि-विधान और लोक मान्यताओं के अनुसार यहां का पूरा आयोजन संपन्न होता है, जो इसे अन्य स्थानों से पूरी तरह अलग बनाता है।

सहस्त्रबाहु की प्रतिमा का खड्ग से वध करने की अनूठी परंपरा

Sihawa Bhitaras Unique Dussehra Festival: इस आयोजन का सबसे मुख्य और रोमांचक आकर्षण सहस्त्रबाहु की नग्न प्रतिमा का वध करना है। स्थानीय कुम्हारों द्वारा विशेष रूप से तैयार की गई इस प्रतिमा का मंदिर के पुजारी द्वारा मंत्रोच्चार और पूरे विधि-विधान के बाद तलवार यानी खड्ग से वध किया जाता है। इस पारंपरिक अनुष्ठान को देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक मैदान में मौजूद रहते हैं, जो इस ऐतिहासिक और पौराणिक प्रसंग से जुड़ी परंपरा का हिस्सा बनते हैं।

पवित्र मिट्टी का तिलक लगाकर मनाई जाती है विजय की खुशी

Ekadashi Dussehra In CG Dhamtari: प्रतिमा के वध के बाद वहां मौजूद श्रद्धालुओं में उसे पाने की होड़ सी मच जाती है। लोग प्रतिमा की मिट्टी को अत्यंत पवित्र मानकर अपने साथ घर ले जाते हैं और एक-दूसरे के माथे पर इसका तिलक लगाकर विजय का जश्न मनाते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, वासना से जुड़े असुर का वध माता चंडिका ने अपने खड्ग से किया था, और इसी धार्मिक विश्वास के आधार पर यह अनूठी परंपरा आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी निभाई जा रही है।

चांदमारी की रस्म और थानेदार को माना जाता है प्रतीकात्मक राजा

सिहावा के इस विशेष दशहरे में केवल प्रतिमा वध ही आकर्षण का केंद्र नहीं होता, बल्कि शीतला माता की आराधना के बाद पारंपरिक चांदमारी की रस्म भी निभाई जाती है। इस दिलचस्प परंपरा के तहत सिहावा थाने के प्रभारी को प्रतीकात्मक रूप से राजा का दर्जा दिया जाता है, जो परंपरा के अनुसार पीपल के पेड़ पर बंधे नारियल पर निशाना साधते हैं। इस कार्य में गांव के सभी समुदायों के लोग मिलकर सक्रिय सहयोग देते हैं।

सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को सहेजे हुए है सिहावा का यह गांव

सिहावा का यह दशहरा अपनी अनूठी पहचान के कारण धमतरी जिले की विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहर बन चुका है। इस पारंपरिक आयोजन में महिलाओं की सीधी भागीदारी नहीं होती है, और रावण दहन के बाद सोनपत्ती बांटने की जगह यहां मिट्टी के तिलक की परंपरा है। बदलते दौर के बावजूद यहां के ग्रामीण अपनी इस प्राचीन और अनूठी संस्कृति को पूरी निष्ठा के साथ सहेज कर रखे हुए हैं।

Also Read: Hinglaj Mata Temple Devsagar: पाकिस्तान के हिंगलाज मंदिर से जुड़ा है छत्तीसगढ़ का यह धाम? जानिए इसकी अनसुनी कहानी

दक्षिण कोसल का Whatsapp Group ज्वाइन करे

Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

Related Articles

Back to top button