
छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में बुधवार को एक सामाजिक बदलाव की तस्वीर सामने आई। यहां रहने वाले दो परिवारों ने ईसाई धर्म का रास्ता छोड़ एक बार फिर अपने मूल सिख पंथ को अपना लिया है। सुपेला स्थित गुरुद्वारे में कीर्तन और अरदास के साथ इन परिवारों की घर वापसी कराई गई। समाज के वरिष्ठ सदस्यों की मौजूदगी में हुए इस कार्यक्रम ने पूरे समुदाय का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
कीर्तन और गुरबाणी के बीच पूरी हुई प्रक्रिया
दुर्ग के सुपेला गुरुद्वारे में कुल छह सदस्यों ने सिख धर्म में दोबारा प्रवेश किया। इनमें चार पुरुष और दो महिलाएं शामिल हैं। इस पूरे कार्यक्रम को पूरी धार्मिक गरिमा के साथ आयोजित किया गया। गुरबाणी के पाठ और अरदास के बाद इन परिवारों का सिख समाज में स्वागत हुआ। यह पहल छत्तीसगढ़ सर्व समाज कल्याण समिति और सिख यूथ सेवा समिति के संयुक्त प्रयासों से सफल हो पाई।
क्यों छोड़ा था धर्म और अब क्यों आए वापस
वापसी करने वाले एक परिवार के मुखिया मनजीत सिंह ने अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि करीब चार साल पहले वे कुछ लालच और बाहरी प्रभाव में आकर ईसाई धर्म में चले गए थे। हालांकि समय बीतने के साथ उन्हें अपनी मूल संस्कृति और पूर्वजों की परंपराओं की कमी महसूस होने लगी। मनजीत का कहना है कि उन्हें एहसास हुआ कि जो अपनापन और आत्मिक शांति अपने मूल धर्म में है, वह कहीं और नहीं मिल सकती।
समाज कल्याण समिति ने निभाई बड़ी भूमिका
छत्तीसगढ़ सर्व समाज कल्याण समिति के अध्यक्ष इंद्रजीत सिंह ने इस पूरी प्रक्रिया का नेतृत्व किया। उन्होंने बताया कि पिछले कुछ सालों में कई परिवार अलग-अलग कारणों से रास्ता भटककर दूसरे धर्मों में शामिल हो गए थे। अब ऐसे कई लोग अपनी जड़ों की ओर लौटना चाह रहे हैं। समिति ऐसे परिवारों की काउंसलिंग करती है और उन्हें बिना किसी दबाव के सम्मानपूर्वक वापस लाने में मदद करती है।
भटकते परिवारों को मिल रहा है समिति का साथ
सिख यूथ सेवा समिति ने स्पष्ट किया है कि घर वापसी सिर्फ एक प्रक्रिया नहीं बल्कि इन परिवारों को समाज का हिस्सा बनाए रखने की जिम्मेदारी है। समिति ऐसे लोगों को सामाजिक और मानसिक समर्थन देती है ताकि वे दोबारा अपनी परंपराओं से जुड़ सकें। इंद्रजीत सिंह के अनुसार आने वाले दिनों में और भी कई परिवारों के वापस लौटने की संभावना है, जिन्हें हर जरूरी मदद दी जाएगी।
पूर्वजों की परंपरा में ही मिली सच्ची शांति
घर वापसी करने वाले दोनों परिवारों ने एक सुर में कहा कि अपनी जड़ों से कटने के बाद वे खुद को अधूरा महसूस कर रहे थे। उन्होंने कहा कि पूर्वजों के दिखाए रास्ते पर चलने में ही उन्हें गौरव का अनुभव होता है। समाज के लोगों ने भी इन परिवारों का खुले दिल से स्वागत किया। इस घटना के बाद स्थानीय स्तर पर धार्मिक और सामाजिक पहचान को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।



