
रायपुर: CG High Court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कांकेर जिले के गांवों में धर्मांतरण रोकने के लिए ग्राम सभाओं द्वारा लगाए गए होर्डिंग्स को लेकर दायर याचिका पर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जबरन या प्रलोभन देकर किए जा रहे मतांतरण को रोकना गंभीर सामाजिक चिंता का विषय है, और इसलिए ऐसे होर्डिंग्स को असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता।
सांस्कृतिक सुरक्षा के लिए ग्राम सभा का कदम
मुख्य न्यायाधीश रमेश कुमार सिन्हा और न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु की खंडपीठ ने जनहित याचिका को खारिज करते हुए कहा कि ग्राम सभाओं ने अपनी सांस्कृतिक विरासत और जनजातीय पहचान की रक्षा के लिए यह कदम उठाया है, जो संविधान की भावना के अनुरूप है।
कोर्ट ने कहा कि जबरन या गुमराह कर कराए जा रहे मतांतरण को रोकने के उद्देश्य से लगाए गए ये होर्डिंग्स सार्वजनिक व्यवस्था और सामाजिक समरसता बनाए रखने के लिए एक जरूरी कदम हैं।
कांकेर के 12 गांवों में लगे हैं विरोध के बोर्ड
यह मामला कांकेर जिले के कुदाल, परवी, बांसला, घोटा, घोटिया, मुसुरपुट्टा और सुलंगी सहित कई गांवों से जुड़ा है। ग्राम सभाओं ने इन गांवों की सीमाओं पर बोर्ड लगाए हैं।
इन होर्डिंग्स में स्पष्ट लिखा है कि गाँव पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में आता है और ग्राम सभा की अनुमति के बिना कोई भी व्यक्ति धर्म परिवर्तन या धार्मिक प्रचार नहीं कर सकता। ग्रामीणों का कहना है कि यह कदम किसी धर्म के विरोध में नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की परंपराओं और संस्कृति की सुरक्षा के लिए उठाया गया है।
ग्रामीणों का पक्ष: प्रलोभन देकर हो रहा है मतांतरण
ग्रामवासियों ने अदालत में कहा कि उनके गांवों में बाहरी लोग लालच, सहायता या गुमराह करके धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश करते हैं। इससे सामाजिक संतुलन और पुरखों की परंपरा पर बुरा असर पड़ रहा है। इसीलिए ग्राम सभाओं ने सामूहिक निर्णय लिया, ताकि गाँव की सांस्कृतिक एकता सुरक्षित रह सके।
याचिकाकर्ता का तर्क: मौलिक अधिकारों का उल्लंघन
Kanker: कांकेर निवासी दिग्बल टोंडी और जगदलपुर निवासी नरेंद्र भवानी ने अपनी याचिकाओं में तर्क दिया था कि ये होर्डिंग्स संविधान के अनुच्छेद 19(1)(डी) (आवागमन की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) का उल्लंघन करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार के ‘हमारी परंपरा, हमारी विरासत’ सर्कुलर से प्रेरित होकर यह कदम उठाया गया है, जिससे धार्मिक स्वतंत्रता बाधित हो रही है।
राज्य सरकार का जवाब और कोर्ट का निर्देश
राज्य सरकार ने अदालत में स्पष्ट किया कि याचिकाएं केवल आशंकाओं पर आधारित हैं। सरकार ने कहीं भी नफरत फैलाने या होर्डिंग लगाने का निर्देश नहीं दिया। सर्कुलर का उद्देश्य केवल अनुसूचित जनजातियों की संस्कृति और सामाजिक सौहार्द की रक्षा करना है।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि यदि उन्हें गांव में प्रवेश को लेकर खतरा महसूस हो, तो वे सीधे पुलिस या जिला प्रशासन से संपर्क कर सकते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन जबरन धर्म परिवर्तन समाज की शांति और सार्वजनिक हित के खिलाफ है। अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता चाहें तो पेसा नियम 2022 के तहत ग्राम सभा या संबंधित अधिकारियों के पास जा सकते हैं।



