शव दफनाने को लेकर आदिवासी अंचल में भारी बवाल: कांग्रेस ने सरकार को घेरा, भाजपा ने धर्मांतरण कानून पर साथ देने की रखी शर्त

छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के आमाबेड़ा में एक धर्मांतरित आदिवासी के शव को ईसाई रीति-रिवाज से दफनाने पर हुए विवाद ने अब राजनीतिक मोड़ ले लिया है। इस घटना के बाद से बस्तर के आदिवासी अंचलों में तनाव की स्थिति बनी हुई है। कांग्रेस ने इस पूरे विवाद के लिए सीधे तौर पर सत्ताधारी दल भाजपा को जिम्मेदार ठहराया है। कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय ठाकुर का कहना है कि सरकार धर्मांतरण के नाम पर समाज को बांटने और लोगों के बीच नफरत की खाई खोदने का काम कर रही है। वहीं, ईसाई संगठनों ने भी आरोप लगाया है कि कुछ खास संगठन जानबूझकर शांतिपूर्ण माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

बढ़ते संघर्ष के आंकड़े: एक साल में सामने आई दर्जनों घटनाएं

छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फोरम के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में आदिवासियों और धर्मांतरित ईसाइयों के बीच शव दफनाने को लेकर विवाद की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। फोरम के अध्यक्ष अरुण पन्ना लाल ने दावा किया है कि साल 2024 में इस तरह के 42 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि 2025 के केवल नवंबर और दिसंबर महीने में ही एक दर्जन से ज्यादा घटनाएं हो चुकी हैं। इससे पहले जनवरी 2024 में बस्तर में एक महिला के शव को लेकर हुए विवाद में 11 लोग जख्मी हुए थे। इसके अलावा, एक पादरी के शव को दफनाने का मामला तो सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया था, जिसके बाद पुलिस की मौजूदगी में अंतिम संस्कार संभव हो पाया।

धर्मांतरण कानून पर वार-पलटवार: भाजपा ने कांग्रेस को दी चुनौती

इस विवाद पर भाजपा ने पलटवार करते हुए कांग्रेस की नीतियों को ही इन परिस्थितियों के लिए दोषी बताया है। भाजपा प्रवक्ता गौरीशंकर श्रीवास ने स्पष्ट किया कि यदि कांग्रेस सच में इस समस्या का समाधान चाहती है, तो उसे आगामी विधानसभा सत्र में सरकार द्वारा लाए जाने वाले धर्मांतरण विरोधी कानून का समर्थन करना चाहिए। भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस केवल तुष्टिकरण की राजनीति कर रही है और धर्मांतरण को बढ़ावा दे रही है। दूसरी तरफ, आम आदमी पार्टी ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए कहा कि प्रशासन आदिवासियों की मूल समस्याओं को हल करने में विफल रहा है।

प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती: निष्पक्ष कार्रवाई की मांग

बस्तर के आदिवासी अंचलों में आदिवासियों और धर्मांतरित ईसाइयों के बीच गहराता यह मतभेद अब प्रशासन के लिए सिरदर्द बन चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए स्थानीय प्रशासन को बिना किसी राजनीतिक दबाव के निष्पक्ष होकर सख्त कदम उठाने होंगे। समाज के बुद्धिजीवियों का कहना है कि जो तत्व शांति भंग करने या धार्मिक भावनाओं को भड़काने का काम कर रहे हैं, उन पर कानूनी नकेल कसना जरूरी है। यदि समय रहते सामाजिक समरसता बहाल नहीं की गई, तो आदिवासी संस्कृति और ग्रामीण शांति को बड़ा खतरा हो सकता है।

Also Read: कोरबा में कलयुगी पिता ने अपनी ही नाबालिग बेटी से की दरिंदगी, मां की गैरमौजूदगी में दिया वारदात को अंजाम

दक्षिण कोसल का Whatsapp Group ज्वाइन करे

Ravi Pratap Pandey

रवि पिछले 7 वर्षों से छत्तीसगढ़ में सक्रिय पत्रकार हैं। उन्होंने राज्य के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहराई से रिपोर्टिंग की है। जमीनी हकीकत को उजागर करने और आम जनता की आवाज़ को मंच देने के लिए वे लगातार लेखन और रिपोर्टिंग करते रहे हैं।

Related Articles

Back to top button