
रायगढ़: छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से जंगली हाथियों की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो इंसान और जानवर के बीच बढ़ते संघर्ष को बयां कर रही है। बंगुरसिया क्षेत्र की सेवा सहकारी समिति में इन दिनों रात के सन्नाटे में हाथियों का दल दस्तक दे रहा है। जंगल में भोजन की कमी और धान की महक इन गजराजों को सीधे सरकारी उपार्जन केंद्र तक खींच ला रही है। पिछले कुछ दिनों में हाथियों ने बड़े ही इत्मीनान से मंडी में धावा बोलकर धान की 44 बोरियां साफ कर दी हैं। स्थानीय लोग इसे ‘धान की चोरी’ का नाम दे रहे हैं, लेकिन यह असल में जंगल में सिमटते संसाधनों और भूख की एक कड़वी हकीकत है।
मचान पर रात बिता रहे कर्मचारी: जान बचाने की जद्दोजहद
हाथियों की इस आवाजाही ने समिति के कर्मचारियों की नींद उड़ा दी है। समिति प्रभारी कुंज बिहारी निषाद का कहना है कि पिछले आठ दिनों से हाथी नियमित रूप से शाम 6 बजे और रात 9 बजे के बाद केंद्र में दाखिल हो रहे हैं। हाथियों के हमले से बचने के लिए कर्मचारियों ने समिति भवन की छत पर मचान बनाया है, जहां वे रात भर जागकर अपनी जान बचाते हैं। कर्मचारी बताते हैं कि हाथी अब इंसानों से डर नहीं रहे हैं, बल्कि सीधे धान के ढेरों तक पहुंच रहे हैं। जैसे ही हाथी नजर आता है, इसकी सूचना तत्काल वन विभाग और प्रशासन को दी जाती है, लेकिन हाथियों का आना बदस्तूर जारी है।

बाउंड्री वॉल न होने से बढ़ी मुसीबत: खुले आसमान के नीचे पड़ा है करोड़ों का धान
बंगुरसिया की इस सहकारी समिति में हाथियों की आवाजाही कोई नई बात नहीं है, यह सिलसिला बरसों से चला आ रहा है। इसके बावजूद अब तक परिसर की घेराबंदी या बाउंड्री वॉल का निर्माण नहीं कराया गया है। बाउंड्री न होने की वजह से हाथियों के लिए मंडी में घुसना बेहद आसान हो जाता है। खुले परिसर ने इस ‘भूख की चोरी’ को हर साल की एक स्थाई समस्या बना दिया है। अधिकारियों की इस अनदेखी का खामियाजा अब कर्मचारियों को अपनी जान जोखिम में डालकर और सरकार को आर्थिक नुकसान के रूप में भुगतना पड़ रहा है।
इंसान और जानवर की मजबूरी आमने-सामने: आखिर कौन है जिम्मेदार?
जंगल के कटने और हाथियों के पारंपरिक रास्तों के खत्म होने से अब हाथी इंसानी बस्तियों का रुख कर रहे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि वे हाथियों को दुश्मन नहीं मानते, लेकिन पेट की आग और सुरक्षा के अभाव ने दोनों को आमने-सामने खड़ा कर दिया है। कर्मचारी हाथियों को देखते ही पीछे हट जाते हैं ताकि कोई खूनी संघर्ष न हो। यहां एक तरफ इंसान अपनी जान और सरकारी संपत्ति बचाने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी तरफ हाथी अपनी भूख मिटाने के लिए बस्तियों में आने को मजबूर है। यह समस्या सिर्फ एक दीवार की नहीं, बल्कि पर्यावरण के बिगड़ते संतुलन की भी है।
31 जनवरी तक है धान खरीदी: और बड़े नुकसान की आशंका
प्रदेश में धान खरीदी का काम 31 जनवरी तक चलना है। ऐसे में समिति के लोगों को डर है कि यदि जल्द ही हाथियों को रोकने के लिए पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए, तो नुकसान का आंकड़ा काफी बढ़ सकता है। अभी तो हाथियों ने सिर्फ धान की बोरियों को निशाना बनाया है, लेकिन डर इस बात का है कि किसी दिन यह भूख किसी बड़ी जनहानि का कारण न बन जाए। ग्रामीण और कर्मचारी अब प्रशासन से गुहार लगा रहे हैं कि जल्द से जल्द सुरक्षा घेरा तैयार किया जाए ताकि वे बिना किसी डर के अपना काम पूरा कर सकें।
प्रशासन से समाधान की मांग: केवल दीवार नहीं, सुरक्षा भी जरूरी
बंगुरसिया के लोग अब केवल एक दीवार की मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे चाहते हैं कि वन विभाग और जिला प्रशासन मिलकर हाथियों के लिए जंगल में ही पर्याप्त भोजन और पानी की व्यवस्था करे। स्थानीय लोगों का मानना है कि जब तक हाथियों को जंगल में चारा नहीं मिलेगा, वे मंडियों और गांवों का रुख करते रहेंगे। प्रशासन की टीम को हाथियों की लोकेशन ट्रैक करने और उन्हें आबादी से दूर रखने के लिए आधुनिक संसाधनों का उपयोग करना होगा, ताकि किसान, कर्मचारी और जंगली जीव तीनों सुरक्षित रह सकें।
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