
आगामी 4 मार्च को देशभर में रंगों का त्योहार होली हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। बाजारों में गुलाल और पिचकारियों की रौनक के बीच एक खास बात जो हर साल देखने को मिलती है, वह है लोगों का सफेद कपड़ों में होली खेलना। रायपुर समेत पूरे छत्तीसगढ़ में होली की तैयारियां जोरों पर हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सप्तरंगी त्योहार में सफेद रंग को ही प्राथमिकता क्यों दी जाती है? दरअसल, इसके पीछे केवल सौंदर्यबोध ही नहीं, बल्कि ज्योतिषीय गणना, आध्यात्मिक शांति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का एक अद्भुत संगम छिपा है।
शुद्धता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक
धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार, सफेद रंग को शुद्धता, शांति और सात्विकता का प्रतीक माना जाता है। होलिका दहन के बाद जब हम रंगों के उत्सव की शुरुआत करते हैं, तो यह बुराई के अंत और एक नई, पवित्र शुरुआत का संदेश देता है। ज्योतिष शास्त्र में सफेद रंग का सीधा संबंध चंद्रमा और शुक्र ग्रह से माना गया है। मान्यता है कि होली के दिन सफेद वस्त्र धारण करने से मन शांत रहता है, क्रोध पर नियंत्रण मिलता है और मानसिक अशांति दूर होती है। यह रंग नकारात्मक ऊर्जा को सोखने के बजाय सकारात्मकता का संचार करता है।

समानता और भाईचारे का ‘कोरा कैनवास’
सफेद रंग को एक कोरे कैनवास की तरह देखा जाता है। जिस प्रकार एक सादे कागज पर हर रंग अपनी पूरी चमक के साथ उभरता है, उसी तरह सफेद कपड़ों पर गुलाल के रंग अधिक स्पष्ट और सुंदर दिखाई देते हैं। यह इस बात का भी प्रतीक है कि हम अपने भीतर के भेदभाव और द्वेष को मिटाकर प्रेम के रंग में रंगने को तैयार हैं। जब अलग-अलग रंगों के छींटे सफेद लिबास पर पड़ते हैं, तो अमीर-गरीब और ऊंच-नीच का भेद खत्म हो जाता है और हर व्यक्ति समानता और सौहार्द के एक ही रंग में नजर आता है।
वैज्ञानिक आधार और शारीरिक शीतलता
होली का त्योहार बसंत ऋतु के समापन और ग्रीष्म ऋतु के आगमन के समय आता है, जब तापमान धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो सफेद रंग ऊष्मा (Heat) का कुचालक होता है और सूर्य की किरणों को परावर्तित (Reflect) कर देता है। इससे चिलचिलाती धूप में भी शरीर का तापमान संतुलित रहता है और ठंडक का अहसास होता है। चूंकि होली का हुड़दंग अक्सर खुले आसमान के नीचे घंटों तक चलता है, इसलिए सफेद सूती कपड़े पहनना स्वास्थ्य की दृष्टि से भी आरामदायक और सुरक्षित विकल्प माना जाता है।



