
छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र का छठा दिन काफी हंगामेदार रहा। प्रश्नकाल के दौरान सदन में उस वक्त स्थिति गरमा गई जब कांग्रेस विधायक और पूर्व आबकारी मंत्री कवासी लखमा ने बस्तर के किसानों की धान खरीदी का मुद्दा उठाया। लखमा ने आरोप लगाया कि बस्तर संभाग के हजारों किसान इस साल अपना धान नहीं बेच पाए हैं, जिससे उन पर कर्ज का बोझ बढ़ गया है। विपक्ष ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह किसानों के नाम पर केवल दिखावा कर रही है। जब खाद्य मंत्री दयालदास बघेल के जवाबों से विपक्षी सदस्य संतुष्ट नहीं हुए, तो उन्होंने सदन में नारेबाजी करते हुए बहिर्गमन (वॉकआउट) कर दिया।
लखमा की ‘ताबड़तोड़ बल्लेबाजी’: 32 हजार किसानों का क्या होगा?
प्रश्नकाल में कवासी लखमा ने बेहद आक्रामक अंदाज में बस्तर के पांच जिलों का मुद्दा पटल पर रखा। उन्होंने दावा किया कि इस साल बस्तर संभाग के लगभग 32,200 किसानों से धान की खरीदी नहीं की गई है। लखमा ने भावुक होते हुए कहा कि इन आदिवासियों ने खेती के लिए कर्ज लिया था और अपनी बेटियों की शादी का सपना संजोया था। उन्होंने सरकार से सीधा सवाल किया कि जब इन किसानों की गिरदावरी हो चुकी थी और उन्होंने पंजीयन भी कराया था, तो फिर उनका धान क्यों नहीं लिया गया? लखमा के अनुसार, अगर यह धान खरीदा जाता तो किसानों को 206 करोड़ रुपये मिलते, जिससे वे अपना कर्ज उतार पाते।
मंत्री बघेल का पलटवार: “खरीदी केंद्र तक नहीं आए किसान”
विपक्ष के तीखे हमलों का जवाब देते हुए खाद्य मंत्री दयालदास बघेल ने कहा कि सरकार ने धान खरीदी के लिए पूरे इंतजाम किए थे। उन्होंने तर्क दिया कि जो किसान धान बेचने के लिए खरीदी केंद्र तक ही नहीं आए, उनसे धान कैसे खरीदा जा सकता है? मंत्री ने दावा किया कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में बस्तर संभाग में पिछली सरकार की तुलना में दो से तीन गुना अधिक धान की खरीदी हुई है। उन्होंने यह भी बताया कि जो किसान किन्हीं कारणों से तय समय पर धान नहीं बेच पाए थे, उनके लिए शासन ने दो दिन का अतिरिक्त समय भी बढ़ाया था।
पूर्व सीएम भूपेश बघेल के चुभते सवाल: “टोकन कटा फिर भी धान क्यों नहीं बिका?”
बहस में शामिल होते हुए पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी सरकार को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने पूछा कि बस्तर के ऐसे कितने किसान हैं जिनका दूसरा टोकन कट चुका था, लेकिन फिर भी उनका धान नहीं खरीदा गया? बघेल ने विशेष रूप से उन ‘ऋणी किसानों’ का मुद्दा उठाया जिनका टोकन कटने के बावजूद धान नहीं बिका। उन्होंने सरकार से पूछा कि क्या वह इन ऋणी किसानों का धान अब खरीदेगी या फिर उनका कर्ज माफ करने का कोई विचार रखती है? इस पर मंत्री बघेल ने पिछली सरकार का हवाला देते हुए कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में भी कई ऋणी किसानों का धान नहीं खरीदा गया था।
लखेश्वर बघेल ने उठाया ‘धान घोटाले’ का मुद्दा
बस्तर के ही विधायक लखेश्वर बघेल ने धान खरीदी और उसके उठाव (ट्रांसपोर्टेशन) की प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगाए। उन्होंने आरोप लगाया कि धान खरीदी केंद्रों पर किसानों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है और वे एसडीएम कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं। उन्होंने इसे एक बड़े घोटाले की संज्ञा देते हुए कहा कि कहीं धान का वजन बढ़ाने के लिए पानी डाला जा रहा है, तो कहीं अनियमितताएं हो रही हैं। उन्होंने मंत्री से वनाधिकार पट्टा धारक और ऋणधारी किसानों का जिलावार आंकड़ा भी मांगा, जिस पर मंत्री ने धान उठाव की विस्तृत जानकारी सदन के पटल पर रखी।
कर्ज कौन पटाएगा? लखमा और मंत्री के बीच तीखी नोकझोंक
सदन में बहस उस वक्त चरम पर पहुँच गई जब लखमा ने बार-बार एक ही सवाल दोहराया कि “जिन किसानों का धान नहीं बिका, उनका कर्ज अब कौन पटाएगा?” खाद्य मंत्री ने जवाब दिया कि जो भी किसान ऋण लेता है, उसका धान अनिवार्य रूप से खरीदा जाता है, बशर्ते वह केंद्र तक आए। लखमा ने इस जवाब को ‘झूठ’ करार देते हुए कहा कि टोकन कटने के बाद भी किसान केंद्रों से वापस लौटाए गए हैं। उन्होंने मांग की कि या तो सरकार बीजापुर और अन्य जिलों के इन किसानों का धान तुरंत खरीदे या फिर उनका पूरा कर्ज माफ करने की घोषणा करे।
स्पष्ट जवाब न मिलने पर विपक्ष का सदन से बहिर्गमन
धान खरीदी और किसानों के कर्ज से जुड़े सवालों पर जब खाद्य मंत्री दयालदास बघेल कोई ठोस आश्वासन नहीं दे पाए, तो विपक्षी सदस्य भड़क गए। कांग्रेस विधायकों ने आरोप लगाया कि सरकार किसानों के प्रति असंवेदनशील है और केवल आंकड़ों की बाजीगरी कर रही है। सदन में भारी शोर-शराबे और नारेबाजी के बीच कांग्रेस के सभी सदस्यों ने एकजुट होकर सदन से वॉकआउट कर दिया। विपक्ष का कहना है कि वे इस मुद्दे पर चुप नहीं बैठेंगे और किसानों के हक के लिए लड़ाई जारी रखेंगे।
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