
दान देने के लिए धन से अधिक बड़े मन की आवश्यकता होती है, और इस कहावत को धमतरी जिले के ग्राम उत्तर सिंगपुर की खम्मन बाई कमार ने सच कर दिखाया है। कमार जनजाति से ताल्लुक रखने वाली खम्मन बाई स्वयं कभी स्कूल की दहलीज तक नहीं पहुँच सकीं, लेकिन आज वे अपने गांव के बच्चों के भविष्य को संवारने के लिए अपनी जीवनभर की कमाई अर्पित कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2026 के अवसर पर उनकी यह कहानी समाज के लिए प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत बनकर उभरी है।
संघर्षों से भरा जीवन, पर शिक्षा के लिए अटूट संकल्प
खम्मन बाई का जीवन चुनौतियों और संघर्षों की एक लंबी दास्तान है। मात्र 9 वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह हो गया और लगभग 16 वर्ष पूर्व बीमारी के कारण उनके पति का देहांत हो गया। वर्तमान में वे अपने दो बेटों, एक बेटी और नाती के साथ सिंगपुर की कमार बस्ती में रहती हैं। उनके पास न तो कोई अचल संपत्ति है और न ही आय का कोई स्थायी साधन। वे आज भी पारंपरिक तरीके से बांस की टोकरियाँ और पत्तल बुनकर अपना गुजर-बसर करती हैं, लेकिन इसी मेहनत की कमाई से वे शिक्षा का उजाला फैला रही हैं।
स्वामी आत्मानंद स्कूल का कायाकल्प: पुस्तकों से लेकर कंप्यूटर तक का दान
खम्मन बाई का लक्ष्य अपने गांव के ‘स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट हिन्दी विद्यालय’ को संसाधनों से परिपूर्ण बनाना है। उन्होंने अपनी छोटी-छोटी बचतों से स्कूल की लाइब्रेरी के लिए 10 हजार रुपये की पुस्तकें, बच्चों के बैठने के लिए दरी, पानी के ड्रम और बर्तन दान किए हैं। आधुनिक शिक्षा की महत्ता को समझते हुए उन्होंने स्कूल को एक स्मार्ट टीवी और हाल ही में एक नया कंप्यूटर सेट भी भेंट किया है। उनके इस निस्वार्थ सहयोग को देखकर स्कूल प्रबंधन और ग्रामीण अचंभित हैं।
उच्च शिक्षा का सपना: गांव में कॉलेज खुलवाने की जिद
खम्मन बाई का सबसे बड़ा सपना है कि उनके गांव सिंगपुर में एक कॉलेज खुले। वर्तमान में सिंगपुर से सबसे करीबी कॉलेज ‘नगरी’ या ‘मगरलोड’ में है, जिनकी दूरी लगभग 30 किलोमीटर है। इतनी लंबी दूरी और आवागमन के साधनों के अभाव के कारण 12वीं के बाद कई प्रतिभावान छात्र-छात्राओं की पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है। खम्मन बाई चाहती हैं कि गांव के बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए दर-दर न भटकना पड़े और वे अपने ही गांव में रहकर अपने सपनों को पूरा कर सकें।
भविष्य के लिए ‘विशेष दान’ की गुप्त योजना
दक्षिण कोसल न्यूज से विशेष चर्चा के दौरान खम्मन बाई ने साझा किया कि वे अगले दो वर्षों में स्कूल को कुछ “विशेष चीज” दान करने की योजना बना रही हैं। हालांकि, उन्होंने इस गुप्त दान का खुलासा करने से मना कर दिया। जब उनसे इस रहस्य के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “यदि मैं अभी बता दूँ और इसे पूरा करने से पहले ही विदा हो जाऊं, तो क्या होगा?” उनकी दूरदर्शिता और सादगी ने जिला प्रशासन, कलेक्टर और स्कूल के प्राचार्य डॉ. वीपी चंद्रा को प्रभावित किया है, जो उनकी इस सेवा भावना की मुक्त कंठ से प्रशंसा कर रहे हैं।



