
छत्तीसगढ़ विधानसभा में बुधवार को ‘छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता संशोधन विधेयक’ पारित कर दिया गया। सदन की कार्यवाही के दौरान इस बिल को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। कांग्रेस विधायकों ने विधेयक के तकनीकी पहलुओं पर सवाल उठाते हुए इसे बिना पूरी जानकारी के पास करने का विरोध किया। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया कि इस बदलाव से किसी भी तरह का आर्थिक नुकसान नहीं होगा। विपक्ष के भारी हंगामे और आपत्तियों के बावजूद बहुमत के आधार पर इस महत्वपूर्ण विधेयक को मंजूरी दे दी गई।
वित्तीय पत्रक पर बवाल: उमेश पटेल ने उठाए सवाल
विधेयक पर चर्चा के दौरान कांग्रेस विधायक उमेश पटेल ने सरकार की प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि बिना ‘वित्तीय पत्रक’ (Financial Memorandum) के किसी भी विधेयक को सदन में लाना और उसे पारित करना संसदीय परंपरा के लिहाज से ठीक नहीं है। उमेश पटेल का तर्क था कि इस संशोधन से राज्य के खजाने को नुकसान हो सकता है और सरकार ने इसकी कोई स्पष्ट जानकारी साझा नहीं की है। उन्होंने सदन को आगाह किया कि बिना बजट आकलन के कानून बनाना भविष्य के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
राजस्व मंत्री की सफाई: “नहीं होगी कोई आर्थिक हानि”
विपक्ष के हमलों का जवाब देते हुए राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने सभी आशंकाओं को खारिज कर दिया। उन्होंने सदन को भरोसा दिलाया कि इस संशोधन विधेयक से राज्य सरकार को कोई वित्तीय घाटा नहीं होने वाला है। मंत्री ने कहा कि चूंकि इस बदलाव में किसी अतिरिक्त खर्च या राजस्व के नुकसान का प्रावधान नहीं है, इसलिए इसके लिए अलग से वित्तीय पत्रक पेश करने की जरूरत नहीं समझी गई। सरकार का मानना है कि यह संशोधन राजस्व प्रबंधन को और अधिक पारदर्शी और सुगम बनाने के लिए जरूरी है।
गलत परंपरा की शुरुआत: विपक्ष ने जताया डर
विधायक उमेश पटेल ने विधेयक के दूरगामी परिणामों पर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि अगर बिना वित्तीय जानकारी दिए बिल पास करने की यह परिपाटी बन गई, तो भविष्य में किसी भी वित्तीय नुकसान के बारे में विधायकों को पता ही नहीं चलेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि जब जनप्रतिनिधियों के पास पूरी जानकारी ही नहीं होगी, तो वे जनहित के मुद्दों पर सार्थक चर्चा कैसे करेंगे? विपक्ष ने इसे एक ‘खतरनाक मिसाल’ करार देते हुए सरकार से पारदर्शिता बरतने की मांग की।
बहुमत से विधेयक पारित: सदन की मिली मंजूरी
विपक्ष के कड़े विरोध और तर्कों के बीच सरकार अपने रुख पर अडिग रही। सदन में चर्चा पूरी होने के बाद जब विधेयक को पारित करने की बारी आई, तो सत्ता पक्ष ने अपने बहुमत का इस्तेमाल किया। शोर-शराबे के बीच ही छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता संशोधन विधेयक को पारित घोषित कर दिया गया। सरकार का दावा है कि इस कानून से जमीन से जुड़े मामलों के निपटारे में तेजी आएगी और आम जनता को दफ्तरों के चक्कर काटने से राहत मिलेगी।
क्या है भू-राजस्व संहिता का महत्व?
छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता राज्य में जमीन की मिल्कियत, लगान, सीमांकन और नामांतरण जैसे मामलों को नियंत्रित करने वाला मुख्य कानून है। इसमें होने वाले किसी भी बदलाव का सीधा असर किसानों और संपत्ति मालिकों पर पड़ता है। यही कारण है कि विपक्ष इस संशोधन को लेकर बेहद सतर्क नजर आया और वित्तीय पत्रक की मांग पर अड़ा रहा। अब इस कानून के लागू होने के बाद ही इसके वास्तविक प्रभाव और विपक्ष द्वारा जताई गई आशंकाओं की सच्चाई सामने आ पाएगी।



